जब विचारों से पहचान बनने लगे

महिला दिवस पर विचारों और आत्मविश्वास को दर्शाती प्रेरक हिंदी कविता

सिल्की अग्रवाल, लेखिका, अहमदाबाद

जब चाय की चुस्की के साथ
लोगों नहीं, विचारों की बात होने लगे।

जब आईने में काजल की लकीर
सवाल की लकीर से हल्की लगे।

जब चेहरे की टैनिंग की चिंता नहीं,
अपनी मुस्कुराहट से प्यार होने लगे।

जब घर से बाहर जाना सवाल नहीं,
संभावनाओं का विस्तार बन जाए।

जब किसी के भद्दे छोटे चुटकुले पर
फीकी हँसी नहीं, तेज़ निगाह दे सको।

जब मन का विस्तार और विचार-विमर्श
व्यक्तिगत आक्षेपों से आगे बढ़ जाए।

जब बिल बाँटने की तुम्हारी क्षमता से
आगे बढ़ सके दर्द बाँटने की क्षमता।

जब तुम्हारे बैग में लिपस्टिक के साथ
एक छोटी-सी किताब भी आ जाए।

तब समझना, महिला दिवस तुम्हारा है।

2 thoughts on “जब विचारों से पहचान बनने लगे

  1. बेहद सार्थक और सटीक सृजन।बहुत बहुत बधाई

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