तुम “तारा” हो
तुम मेरे आकाशगंगा का तारा हो—जो मेरे ख्वाहिशों के लिए टूटने को तैयार रहती हो, अपनी खुशियों, समय और संसाधनों को बटोरकर भी प्रकाश फैलाती रहती हो। तुम मुझे सपने सच करने का साहस देती हो और सिखाती हो कि दूसरों के लिए भी तारा बनना संभव है।

तुम मेरे आकाशगंगा का तारा हो—जो मेरे ख्वाहिशों के लिए टूटने को तैयार रहती हो, अपनी खुशियों, समय और संसाधनों को बटोरकर भी प्रकाश फैलाती रहती हो। तुम मुझे सपने सच करने का साहस देती हो और सिखाती हो कि दूसरों के लिए भी तारा बनना संभव है।
कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जो कही नहीं जातीं, लेकिन दिल की गहराइयों में अनवरत बहती रहती हैं — सिसकती हुई, दबी हुई, फिर भी महसूस होती हुई। ये धड़कनों में छिपे वो एहसास हैं जो न पूरी तरह अव्यक्त हैं, न पूरी तरह अभिव्यक्त। दिल मानो एक ऐसा प्रयाग है जहाँ हर भावना, हर याद, हर संबंध एकत्र हो जाता है — जैसे गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम।हाल ही में जन्मे एक मासूम से इश्क़ ने मन को कुंभ की तरह भीगो दिया है — वह भी मौन में, तप में, जल में और हवा के हर स्पर्श में। तेरी उपस्थिति जैसे हर तत्व में घुल गई है। इस भावनात्मक संगम में अब प्रेम और भक्ति एकसाथ बह रहे हैं। मन जैसे प्रयागराज बनकर इंद्रियों में शंखनाद कर रहा है — बुला रहा है, कि अब इस प्रवाह में तुम भी आ जाओ।
समाचार पत्र के आठवें पृष्ठ के एक छोटे से समाचार ने उसे हिला दिया “ गाँव बिकाऊ है “| उसने इन तीन शब्दों को कई – कई बार पढ़ा | सोचने लगा , आवश्यकता और सुख के साथ – साथ पशु – पक्षी और मनुष्य तो बिक ही रहे थे अब गाँव भी ..`..
अजीब सा लगा उसे | घबराहट सी हुई |उसने अपने बैग को उठा कर गले में डाला और बाइक निकाल जा पहुंचा उस गाँव जहां बड़े – बड़े समाचार – पत्रों , चैनल्स की गाड़ियां साथ ही सरकारी तंत्र और वसाइयों की भी गाड़ियाँ खड़ी थीं | कैमरे चमक रहे थे | दाम लग रहे थे …
पता है किसके ……धूल उड़ाती , दरारों पटी बंजर जमीन के … अपनी ही गहराई नापते कुओं के … घर मकानों के… कोई नहीं पूछ रहा था पशुओं को ? न ही वहाँ के लोगों को ?
यह एक माँ की हिम्मत, आत्मविश्वास और अनुभवों की कहानी है — जो अपने दो बच्चों के साथ अकेले कश्मीर की वादियों में निकल पड़ी। पुलवामा की घटना के बाद जब डर और संदेह ने मन को जकड़ रखा था, तब भी उसने फैसला किया कि ज़िंदगी के इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देगी। डर के उस पार फैली थी बर्फ़ से ढकी पहाड़ों की शांति, मेहमाननवाज़ लोगों का अपनापन और एक माँ के दिल में दर्ज़ हो गई यादों की चमक।
काफ़ी वक्त हो गया है,
अब कोई नहीं पूछता लड़कों से ख़ैरियत।
किसी को दिलचस्पी नहीं रहती यह जानने में कि वो ठीक हैं या नहीं।उनसे बस पूछा जाता है उनकी हैसियत, सैलरी और सफलता के पैमाने।ज़रा-सा पीछे रह जाने पर उनके हिस्से में आती हैं . आलोचना, तंज और एक लंबी चुप्पी,जिसमें उनका मन ख़ुद से ही लड़ता रहता है।
“नारी का अस्तित्व बस इतना सा…” कविता समाज में नारी की वास्तविक स्थिति और उसके संघर्षों को उजागर करती है। यह रचना दर्शाती है कि कैसे नारी को कभी देवी तो कभी दासी बनाकर उसके अधिकारों को सीमित किया गया। यह कविता नारी सम्मान, समानता और सशक्तिकरण का गहरा संदेश देती है।