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उखड़ने के बाद भी ना हारा… देखिए इस पीपल की जिद!

जड़ों से उखाड़े जाने के बाद भी मुस्कुराना कैसे संभव है, यह सांवेर रोड की पहाड़ी पर लगाए गए पीपल के तने से सीखा जा सकता है। बिना शाखाओं के रहकर भी उसने हरियाली का संदेश दिया है। नगर निगम की यह पहल न सिर्फ पर्यावरण बचाने की मिसाल है, बल्कि पेड़ ट्रांसप्लांटेशन की एक प्रेरणादायक कहानी भी है।

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“देह, निर्णय और दरारें”

पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?

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“किताब”

किताबें सचमुच खुशनसीब होती हैं। हर कोई उन्हें खोलकर पढ़ना चाहता है, उनकी गहराइयों तक उतर जाना चाहता है। मगर हम… हम तो अपनी ज़िंदगी यूँ ही किताबों से बातें करते हुए गुज़ार देते हैं। पता नहीं, हमारी अपनी गहराइयों को समझने वाला कौन होगा…और कब आएगा…जो हमें भी किसी किताब की तरह ध्यान से पढ़ सके, और हमारी ख़ामोश निगाहों में छिपे अर्थों को समझ पाए।

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“स्त्री-मन की व्यथा और अस्तित्व की खोज: ‘अवनि से अंबर तक

साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।

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भारतीय रेल यात्रा के दौरान परिवार के साथ रखा पारंपरिक बिस्तरबंद

बिस्तरबंद: जब सफ़र में घर साथ चलता था

एक समय था जब हर यात्रा का सबसे भरोसेमंद साथी “बिस्तरबंद” होता था। उसमें सिर्फ बिस्तर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सहूलियत, बचपन की जिज्ञासाएँ और सफ़र की गर्माहट बंद होती थी। आज भले ही एयरबैग ने उसकी जगह ले ली हो, पर यादों में बिस्तरबंद अब भी ज़िंदा है।

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जब आती थी रामलीला..

महिदपुर रोड पर आयोजित रामलीला में हनुमान जी की झांकी सबसे रोमांचकारी थी. केले और फलों से लदे पेड़ों को छलाँग लगाकर तोड़ते, अशोक वाटिका उजाड़ते, और कभी-कभी फल दर्शकों की ओर उछालते। दर्शक इसे श्रद्धा से हनुमान जी का प्रसाद मान लेते थे।

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राउज एवेन्यू कोर्ट के बाहर मीडिया की मौजूदगी के बीच दिल्ली आबकारी नीति केस पर सुनवाई।

शराब घोटाला: केजरीवाल और मनीष सिसोदिया बरी

दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत सभी आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया। अदालत ने CBI की जांच पर गंभीर सवाल उठाए।

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भीड़भाड़ वाले भारतीय शहर के बाज़ार में ट्रैफिक जाम के बीच खड़ी एक महिला मुस्कुराते हुए अपने आसपास की चहल-पहल को देख रही है। सड़क पर वाहन, दुकानदार, राहगीर और बाजार की हलचल दिखाई दे रही है, जो अपने शहर के प्रति अपनापन, जीवंतता और जीवन के उत्साह को दर्शाती है।

खोया हुआ शहर

विदेश की सुव्यवस्थित और मशीनी जिंदगी छोड़कर अपने शहर की भीड़, जाम, बिजली कटौती और जीवंत हलचल में लौटने वाली एक महिला की कहानी। यह कथा बताती है कि जीवन केवल सुविधाओं का नाम नहीं, बल्कि उन धड़कनों का भी नाम है जो हमें अपनेपन का एहसास कराती हैं।

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भारतीय परिवार की तीन पीढ़ियाँ सम्मानपूर्वक संवाद करती हुईं, जहाँ नई पीढ़ी आत्मविश्वास से अपनी बात रख रही है।

क्या यह कम है ?

क्या संस्कार का अर्थ केवल आज्ञाकारिता है, या सच कहने का साहस भी? यह लेख उस पीढ़ी की कहानी है जिसने स्वयं चुप रहकर जीवन जिया, लेकिन अपने बच्चों को प्रश्न पूछना, तर्क करना और सम्मान के साथ अपनी बात कहना सिखाया।

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आसमान की ओर देखते हुए आत्मचिंतन में डूबा एक युवा, जो अपनी पहचान और जीवन के उद्देश्य की तलाश कर रहा है।

मैं कौन हूँ ?

“मैं कौन हूँ?”—यह सिर्फ़ तीन शब्दों का सवाल नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी का सफ़र है। यह लेख एक युवा की आत्मखोज, संघर्ष, बदलाव, आत्मविश्वास और सपनों की कहानी है, जो बताती है कि इंसान की असली पहचान उसके निरंतर सीखने और बदलने की प्रक्रिया में छिपी होती है।

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