लड़कों से कोई नहीं पूछता ख़ैरियत

सुधांशु द्विवेदी , बांदा , उत्तर प्रदेश

काफ़ी वक्त के बाद नहीं पूछता कोई लड़कों से ख़ैरियत।

नहीं जानना चाहता कोई उनके दिल की बात, उनकी मनःस्थिति को।

नहीं होती किसी की दिलचस्पी यह जानने में कि वो ठीक हैं या नहीं।

उनसे बस पूछी जाती है उनकी हैसियत, सैलरी —
और देखा जाता है कि वो सामाजिक मानकों में सफल हैं या नहीं।

उन्हें बताई जाती है उनकी ज़िम्मेदारी,
और तय मानक से ज़रा-सा पीछे रह जाने पर
उनके हिस्से में आती हैं
आलोचना, तंज, खालीपन,
अपने आप से जूझता मन और आत्म-संदेह।

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