रामलीला में एक अप्रत्याशित हादसा

यह घटना 1987 की है, जब मैं पीलीभीत के बीसलपुर में उपजिलाधिकारी था। दशहरे मेले में रावण के दरबार में स्थानीय नर्तकियाँ—पतुरिया—नृत्य करती थीं। उस वर्ष पुलिस उपाधीक्षक ने इस नृत्य पर रोक लगा दी। दशहरे के दिन, रावण बने कलाकार ने मुझसे पानी मांगा जिसे मैंने तुरंत दिया। लेकिन कुछ ही देर बाद वही कलाकार अचेत हो गया और चिकित्सालय पहुँचने पर मृत घोषित कर दिया गया। रावण वध उस वर्ष नहीं हो सका और मेला एक त्रासदी में समाप्त हुआ।यह एक याद दिलाती घटना है कि रावण का वध चाहे पुतले से हो या रामलीला में निभाए गए किरदार से, मृत्यु अपरिहार्य होती है।

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बरसात के बीच गाँव की पगडंडी पर खड़ी एक युवती, दूर से आते प्रियजन के साथ प्रेम और सुकून का भाव, बादलों के बीच उभरता इंद्रधनुष और हरियाली से भरा शांत वातावरण

इंद्रधनुष सा प्रेम

यह कविता प्रेम की उस गहराई को व्यक्त करती है, जो केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जीवन के हर दर्द को सहेजकर उसे सुकून में बदल देती है। प्रिय का साथ मानो सावन की पहली बारिश की तरह है, जो तपती हुई धरती यानी थके हुए मनको ठंडक और नई ऊर्जा देता है।

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एक कतरा प्यार

वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।

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जीरो पॉइंट तक का बर्फीला रोमांच

सवेरे-सवेरे हम श्रीनगर से सोनमर्ग के लिए निकले, लेकिन हमें यह अंदाज़ा नहीं था कि असली रोमांच तो सोनमर्ग के आगे शुरू होगा — जब हम 11600 फीट की ऊंचाई पर स्थित जीरो पॉइंट की ओर बढ़े। हरियाली भरे सोनमर्ग से लेकर बर्फीले ज़ोजिला दर्रे तक का यह सफर एक ओर प्रकृति की अद्भुत सुंदरता दिखाता है तो दूसरी ओर मानव की साहसिक सीमाओं को छूता है। ज़ोजिला टनल का निर्माण इस दुर्गम क्षेत्र में इंजीनियरिंग की एक मिसाल है। प्रकृति की यह बर्फीली गोद हमें सिखाती है कि जीवन छोटा है, इसलिए इसे प्यार और अपनों के साथ भरपूर जिया जाए।

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शब्दकोष बना… पर मान्यता नहीं मिली!

निमाड़ी भाषा को लोकभाषा का दर्जा दिये जाने के लिये दशकों से संघर्ष कर रहे जगदीश जोशीला (खरगोन) को इस बात का दुख है कि सरकार निमाड़ी की अनदेखी करती आ रही है। अब तक 56 से अधिक किताबों में 28 निमाड़ी भाषा में लिख चुके साहित्यकार जोशीला को भले ही इस भाषा का शब्दकोष बनाने पर पद्मश्री से सरकार ने सम्मानित किया हो किंतु उनके मन में टीस है कि मालवी सहित अन्य चार भाषाओं को तो लोकभाषा मान लिया गया लेकिन निमाड़ी आज भी बोली ही मानी जा रही है।

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दिलों को जोड़ती, नफरतों को तोड़ती हिंदी

हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।

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भारतीय साहित्य संकल्पना और वैश्विक प्रभाव पर मंथन

विश्व शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना, उज्जैन द्वारा मराठा मंदिर साहित्य शाखा, मुंबई एवं विश्व हिन्दी प्रचार प्रसार संस्थान, पुणे के सहयोग से दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संचेतना महोत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर “भारतीय साहित्य : संकल्पना और वैश्विक प्रभाव” विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं बहुभाषी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।
मुख्य अतिथि श्री सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ (नॉर्वे) और मुख्य वक्ता प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा (उज्जैन) सहित देश-विदेश के अनेक विद्वानों ने भाग लिया। संगोष्ठी में भारतीय साहित्य की वैश्विक भूमिका, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। शाम को हुए कवि सम्मेलन में भारत, अमेरिका और नॉर्वे के कवियों ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह आयोजन साहित्यिक आदान-प्रदान, भारतीय विचारधारा और विश्व शांति के संदेश को समर्पित रहा।

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