“मन की देहरी: संवेदनाओं का प्रवेशद्वार”

“‘मन की देहरी’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो पाठक को भीतर तक छू जाता है। पूनम सिंह जी की सरल और भावपूर्ण कविताएँ प्रेम, स्मृति और स्त्री-मन की गहराई को उजागर करती हैं। प्रत्येक पंक्ति जैसे पाठक के अपने अनुभवों का प्रतिबिंब है। एक पुस्तक जो संवेदनाओं और आत्मिक प्रेम का संसार खोलती है।”

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हरीतिमा

हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”

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स्त्री

स्त्री, हर ताले की चाबी अपने पास रखती है। घर के हर कोने में, हर रिश्ते में, वह सबकी ज़रूरतों और सपनों के ताले बड़ी आसानी से खोल लेती है। लेकिन विडंबना यह है कि उसके पास कभी अपनी ही मनमर्ज़ी की चाबी नहीं होती। दूसरों के लिए खुली हुई दुनिया के बीच, उसके अपने इच्छाओं का द्वार अकसर बंद रह जाता है।

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तकनीक का जाल: सुविधा या बढ़ता खतरा ?

डिजिटल युग में बढ़ते अपराधों के बीच यह लेख तकनीक के सही और गलत उपयोग, किडनैपिंग के बदलते स्वरूप और समाज में संतुलित सोच की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।

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बिल्कुल तुम्हारी तरह

पति-पत्नी के रिश्ते में तुलना, अपनापन और प्रेम की हल्की नोकझोंक को बयां करती यह भावनात्मक हिंदी लघुकथा बताती है कि हर रिश्ता अपनी अलग पहचान चाहता है।

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“कोमल नहीं, मजबूत है कलाई”

स्त्री केवल कोमल नहीं, बल्कि परिवार और समाज की धुरी है। संस्कार, व्रत, उपवास और साधना के माध्यम से वह न केवल अपने भीतर शक्ति और संयम विकसित करती है, बल्कि पूरे परिवार को एक सूत्र में बाँधती है। यह कविता स्त्री की आंतरिक ऊर्जा, परंपरा और सशक्तिकरण को उजागर करती है।

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रील्स की चमक में खो गई वो पुरानी शादी

कभी शादियाँ सिर्फ दो लोगों का नहीं, पूरे मोहल्ले का उत्सव हुआ करती थीं। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले बन्ने-बन्नी के गीत, बुआ-मौसी की हंसी, आँगन में उबलती खीर . सब जैसे आज भी स्मृतियों में ताजे हैं। पर अब शादी की रस्में कैमरे की फ्रेमिंग में बंध गई हैं, और भावनाएँ फिल्टरों के नीचे धुंधली।

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कड़ी धूप में काम करती एक भारतीय मजदूर महिला, चेहरे पर थकान और उम्मीद, पीछे पढ़ते बच्चे, दो वक्त की रोटी के संघर्ष का भावुक दृश्य।

रोटी दो जून की

अर्पणा सिंह “अर्पी” , रांची बड़ी मुश्किलों से मिल पाती है निजात,मज़दूरों को पाने में रोटी दो जून की सौगात। बैशाख की दोपहरी की धूप या बहती लू,पसीने से लथपथ हो या हो तपती भू।तन ढकने को वसन और मिटाने को भूख,इसी की आपूर्ति में रहते हैं हर पल मशगूल। बड़ी मुश्किलों से मिल पाती…

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बहू नहीं कोई देवी हो

यह कहानी नारी के कर्तव्य, परिश्रम और ससुराल में सम्मान पाने की प्रेरक कहानी है। नीरा, स्वभाव से मेहनती, संवेदनशील और न्यायप्रिय, अपने सास-ससुर के प्रति समर्पित रहती है। शादी के बाद पति के ड्यूटी पर चले जाने के बावजूद वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होती।

कठोर व्यवहार और अन्याय के बावजूद नीरा अपने नेकनीयती और परिश्रम से अपने सास-ससुर को उचित सम्मान दिलाती है। उसके इस समर्पण और अपनापन को देखकर परिवार और समाज भी उसे आदर और सम्मान देने लगते हैं। कहानी में नारी शक्ति, सशक्तता और पारिवारिक प्रेम का संदेश प्रमुख रूप से उजागर है।

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गोल्डन टेम्पल मेल अब बांद्रा से ही चलेगी.

गोल्डन टेम्पल मेल अब बांद्रा से ही चलेगी

गोल्डन टेम्पल मेल का टर्मिनल बदलाव अगले छह माह तक जारी रहेगा. ट्रेन संख्या 12903 और 12904 अब मुंबई सेंट्रल के बजाय बांद्रा टर्मिनस से ही संचालित होंगी. यात्रा से पहले अपडेट जरूर देखें.

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