जहाँ खंडहर भी प्रेम की कहानी सुनाते हैं

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज
दुनिया मांडू को सिटी ऑफ जॉय कहती है, लेकिन जो एक बार उसे ठहरकर महसूस कर ले, उसके लिए मांडू हमेशा सिटी ऑफ लव ही रहता है। मध्यप्रदेश के तमाम पर्यटन स्थलों में अगर किसी जगह की हवा में सबसे ज़्यादा भावनाएँ घुली हैं, तो वह मांडू है। यहाँ महलों की भव्यता से ज़्यादा, खंडहरों की खामोशी बोलती है।
मैं हर साल मांडू जाता हूँ..सिर्फ कोरोना काल को छोड़कर।कुछ लोग मानसून में आते हैं, जब बादल वादियों से लिपट जाते हैं।
कुछ सर्दियों में, जब धूप पत्थरों पर ठहर जाती है। मैं किसी भी मौसम में जा सकता हूँ..यहाँ तक कि गर्मियों में भी, जब एमपी टूरिज़्म के कॉटेज में कूलर के लिए बीस रुपये की एक बाल्टी पानी मिलती हो। क्योंकि मांडू का असली सौंदर्य मौसम नहीं, अनुभव है।रात के समय, जब चारों ओर सन्नाटा पसर जाता है, तब दूर बसे आदिवासी गाँवों से आती लोकगीतों और बाँसुरी की आवाज़ें मन को मदहोश कर देती हैं। अगर आप ठहरकर सुनें, तो लगता है जैसे समय रुक गया हो। और अगर ज़रा-सा भी गहराई से महसूस करें, तो मांडू की रुमानियत आपको बेचैन कर सकती है। मैंने यह बेचैनी कई बार महसूस की है।

कहते हैं, हर शहर अपने राजा-महाराजाओं या बादशाहों से पहचाना जाता है। लेकिन मांडू एक ऐसा शहर है, जो एक रानी के नाम से जीवित है- रानी रुपमती। रुपमती केवल सुंदर नहीं थीं, वह संगीत की साधिका थीं। गायन और वादन उनकी आत्मा में बसता था। जब मालवा के शासक बाज बहादुर ने उन्हें पहली बार देखा, तो यह सिर्फ पहली नज़र का आकर्षण नहीं था.यह वह प्रेम था, जो इतिहास की दिशा बदल देता है। उनका रिश्ता शब्दों का मोहताज नहीं था। वे एक-दूसरे की खामोशी समझ लेते थे। इसी प्रेम के सम्मान में बाज बहादुर ने मांडू की 3500 फीट ऊँचाई पर रानी रुपमती के लिए एक महल बनवाया. ताकि वह हर दिन स्नान के बाद माँ नर्मदा के दर्शन कर सके। आज भी उस महल से दिखती वादियाँ मानो उस प्रेम की गवाह हैं।
कुछ समय तक जीवन सुर-ताल में बहता रहा। लेकिन सच्चे प्रेम की तरह, इस कहानी में भी सत्ता की परछाईं आ गई। रुपमती की कला और सौंदर्य की चर्चा मुगल दरबार तक पहुँची। बादशाह अकबर ने आदेश दिया कि रानी को दिल्ली दरबार भेजा जाए। बाज बहादुर ने इंकार कर दिया। और यही इंकार युद्ध का कारण बन गया। अकबर ने अपने सेनापति आदम खान को विशाल सेना के साथ मांडू भेजा। बाज बहादुर बंदी बना लिए गए। जब अकबर के सैनिक रानी रुपमती को लेने महल की ओर बढ़े, तो उसने एक पल के लिए भी समझौता नहीं किया। उसने सत्ता को नहीं, प्रेम को चुना और अंगूठी का हीरा निगलकर प्राण त्याग दिए। बाज बहादुर को दिल्ली ले जाया गया। जब अकबर को रुपमती के बलिदान का समाचार मिला, तो उसने बाज बहादुर को मुक्त कर दिया। आज़ाद होकर बाज बहादुर मांडू लौटे सीधे रानी रुपमती की मजार पर। और वहीं, उसी प्रेम के सामने, उन्होंने भी जीवन त्याग दिया। इतिहास कहता है उस समय का सबसे शक्तिशाली शहंशाह भी उनके प्रेम को नहीं हरा सका।
अकबर ने दोनों की समाधियाँ बनवायीं। बाज बहादुर की मजार पर लिखा गया-“आशिक-ए-सादिक” और रानी रुपमती की समाधि पर“शहीद-ए-वफ़ा”आज, सदियों बाद भी, मांडू की हवा में यह प्रेम सांस लेता है। रात के सन्नाटे में, बाँसुरी की हर तान के साथ, लगता है रुपमती अब भी अपनी नर्मदा को देख रही है और बाज बहादुर अब भी उसे सुन रहा है। शायद इसीलिए, मांडू सिर्फ देखने की जगह नहीं-महसूस करने की जगह है।

बहुत सुंदर
बेहतरीन प्रस्तुति।
Very nice
कितना सुंदर संस्मरण 👌