
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज
वह किसी पोस्टर पर छपी निडर स्त्री नहीं थी. न ही हर बहस में आगे बढ़कर अपनी ताक़त साबित करने वाली कोई प्रतीकात्मक नायिका. अनन्या उन अनगिनत महिलाओं में से एक थी, जिनकी शक्ति शोर नहीं करतीवह संतुलन रचती है. महानगर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में अनन्या ने अपने लिए एक व्यवस्थित संसार गढ़ रखा था. दो बच्चों की माँ, जिम्मेदार जीवनसाथी, आत्मनिर्भर पेशा और स्पष्ट दिनचर्या. बाहर से सब कुछ सामान्य, सधा हुआलेकिन भीतर एक अनुभव था, जिसने उसे जीवन को नए ढंग से समझना सिखाया था.
कभी उसके विश्वास की ज़मीन चुपचाप खिसक गई थी. किसी अपने ने बिना कोई दृश्य बनाए, उसके भीतर गहरी दरार छोड़ दी थी. उस दिन के बाद अनन्या ने खुद को कठोर नहीं बनाया, बल्कि सचेत बनाया. उसने यह नहीं तय किया कि वह किसी पर भरोसा नहीं करेगीउसने तय किया कि अब वह सबसे पहले खुद की सुरक्षा करेगी.
अनन्या मिलनसार थी. वह हँसती थी, बातें करती थी, रिश्ते निभाती थीलेकिन अपनी सीमाओं के साथ. उम्र में बड़े लोग उसे स्थिरता और मार्गदर्शन देते थे, छोटे लोग जीवन का सहजपन. लेकिन हमउम्र पुरुषों के साथ उसने एक सहज, शालीन दूरी चुनी.
लोगों ने सवाल उठाए. किसी ने इसे घमंड कहा, किसी ने डर, किसी ने भावनात्मक कमजोरी. लेकिन अनन्या जानती थीहर दूरी डर से नहीं बनती. कुछ दूरियाँ अनुभव से जन्म लेती हैं.
कार्यस्थल पर जब एक चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट आया, तो उसकी दक्षता किसी से छिपी नहीं थी. फिर भी एक सहकर्मी ने अनायास पूछ लिया, इतनी सक्षम होकर भी तुम खुद को सीमित क्यों रखती हो?
अनन्या मुस्कुराई. यह मुस्कान आत्मविश्वास से भरी थी, स़फाई देने की ज़रूरत से नहीं.
सीमाएँ मुझे रोकती नहीं हैं,उसने कहा, सीमाएँ मुझे बिखरने से बचाती हैं.यही अनन्या की परिभाषा थी. उसने न खुद को साबित करने की जल्दबाज़ी की, न किसी सामाजिक मान्यता का बोझ ढोया. वह आगे बढ़ती रही. अपने काम में भी, अपने रिश्तों में भी और अपने भीतर भी.समय ने उसे सिखाया कि विश्वास कोई सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि एक सजग चयन है. हर रिश्ता, हर निकटता, हर दूरीसबका अपना समय और स्थान होता है. आज अनन्या उन महिलाओं के लिए एक आईना है, जो मानती हैं कि सशक्त होना मतलब हर जगह उपलब्ध होना नहीं है. सशक्त होना यह जानना है कि कहाँ रुकना है,किसे कितना स्थान देना है और खुद को सबसे पहले कैसे सुरक्षित रखना है. क्योंकि जो स्त्री अपनी सीमाओं को पहचान लेती है, वही स्त्री सबसे दूर तक उड़ती है.

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इसको पढ़कर ऐसा लगा कि ये मेरी ही भावनायें है और ये मैं हूँ
धन्यवाद पूनमसिंहजी आपकी टिप्पणी के लिए. मैं आप की भावनाओं तक पहुंच सका. इसी तरह आप अपनी टिप्पणी अवश्य करें