एक शब्द नहीं, पूरा ब्रह्मांड है माँ

माँ कोई साधारण शब्द नहीं है। वह भाषा के नियमों से आगे जाकर संवेदना का रूप ले लेती है। उसे किसी संज्ञा, सर्वनाम या अलंकार में बाँधने की हर कोशिश अधूरी रह जाती है। माँ की ममता किसी कविता, किसी छंद या महाकाव्य की सीमा में नहीं समाती। वह एक ऐसा अनंत विस्तार है, जिसे समझने का प्रयास करते-करते शब्द स्वयं छोटे पड़ जाते हैं।

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रावण बहुतेरे

आज रावण के पुतले भले ही जलाए जाएँ, लेकिन वास्तविक रावण अब दस सिर वाले नहीं हैं। वे एक सिर वाले हैं और समाज में असंख्य रूपों में मौजूद हैं। जहाँ बाहर श्याम वस्त्रों में रावण का प्रतीक जलता है, वहीं श्वेत वस्त्रों में छुपे अनेक रावण रोज़ हमारे बीच घूमते हैं। यह रावण अब केवल सीता-हरण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हर दिन न जाने कितनी सीताओं का अपहरण और चीर-हरण होता है। मासूमियत की नीलामी होती है और हवस की भट्टी में उसका भस्म किया जाता है। असली चुनौती इन सफेदपोश रावणों का दहन करने की है। सच्चा विजयदशमी तभी होगी जब इनका सर्वनाश किया जाए।

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जग को रोशन करने वाले मानवता, सत्य और प्रेम का प्रेरक संदेश

जग को रोशन करने वाले

“जग को रोशन करने वाले” एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है जो पाठक को स्वयं प्रकाश बनने का संदेश देती है। यह कविता करुणा, प्रेम, सत्य और साहस के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा देती है। टूटे मनों में आशा का दीप जलाने और नफरत को पिघलाने की पुकार इस रचना को विशेष बनाती है।

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गुज़र जाने के बाद…

तूफ़ान गुजरने के बाद बर्बादी की तस्वीर सामने थी। होश आया तो बस खालीपन और ग़म ही हाथ लगा। मेहंदी का नाम गीतों में मशहूर है, पर दुल्हन की हथेलियों पर उसका रंग तब ही सँवरता है जब वह अपने घर पहुँचती है। ज़िंदगी ने कई ज़ख्म दिए थे, मगर सबसे गहरा घाव तेरे मुकर जाने के बाद ही मिला। डर है कहीं जंगल भी इतिहास न बन जाएं और शजर खो देने पर हमें अपनी भूल पर पछताना न पड़े। अब कनक किससे अपना दिल का हाल कहे—प्यार का नशा तो आता है, पर उसका असर देर से समझ आता है, जब सब कुछ बीत चुका होता है।

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अहंकार में डूबा व्यक्ति, चारों ओर धूल और धुंध, पीछे जलती हुई बगिया और प्रतीकात्मक अराजकता

आत्ममुग्धता

धूल जब गगन को छूती है, तब भी एक कंकर अपनी ही धुन में डूबा रहता है यही आत्ममुग्धता है। इस दुनिया में कई लोग अपने अहंकार के कहकहे लगाते हैं, बिना यह देखे कि उनकी ही कारगुजारियाँ उनके आसपास के चमन को जला रही हैं। वे उस बगिया को बारूद बना देते हैं, जिसे प्रेम और बलिदान से सींचा गया था यही हमारी सामाजिक विडंबना है।

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अक्षय तृतीया पर सेवा का अनोखा उदाहरण

अक्षय तृतीया पर सेवा, संस्कार और उत्सव का संगम

कांठेड़ परिवार ने अक्षय तृतीया पर गौशाला में सेवा कर जन्मदिन और व्यवसाय की वर्षगांठ को खास अंदाज में मनाकर समाज को प्रेरणादायक संदेश दिया।

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कन्हैया

मैं कन्हैया को ढूँढ रही हूँ। घर, बाहर, देहरी, हर द्वार पर तलाश करती हूँ, पर न जाने किन कुंज-गलियों में वह छिपा हुआ है, मानो आज फिर मटकी फोड़ने आया हो।वह तनिक भी पास नहीं आता। छलिया रोज़ कोई न कोई छल करके निकल जाता है। मैं मथ-मथकर माखन तैयार करती हूँ, पर पता नहीं वह इसे कैसे भोग लगाता है।वह चोर की तरह घर के भीतर आ जाता है, हंडिया से माखन ले जाता है। मैं सोचती हूँ कि उसे कैसे पकड़ूँ, लेकिन वह तो क्षण भर में अदृश्य हो जाता है। अब तो कोई उपाय बताओ। उस माखन चोर को ढूँढकर लाओ। नंद बाबा से जाकर कोई कहो, ताकि मेरे इस व्याकुल हृदय को चैन मिल सके।

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एक + एक = हम। जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ तुम्हारा नाम मेरी धड़कन बन जाता है।

एक + एक = हम

सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग गणित पढ़ाः था हमने,अंक गिने, समीकरण सुलझाए,पर तुम्हें देखकर समझ आयाकुछ प्रश्न ऐसे होते हैंजिनका कोई हल नहीं,बस अनुभव होता है|कविताएँ शब्दों से बनती हैं,शब्द अर्थ खोजते हैं,पर तुम्हारी मुस्कानबिना शब्दों केपूरी कविता कह जाती है|गैलीलियो, तुम सच कहते होईश्वर ने ब्रह्मांडगणित की भाषा में लिखा है,पर मेरे हृदय का आकाशउसने…

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राउज एवेन्यू कोर्ट के बाहर मीडिया की मौजूदगी के बीच दिल्ली आबकारी नीति केस पर सुनवाई।

शराब घोटाला: केजरीवाल और मनीष सिसोदिया बरी

दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत सभी आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया। अदालत ने CBI की जांच पर गंभीर सवाल उठाए।

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नानी के गाँव में चूल्हे पर रोटी बनाती दादी और नीम की छाँव में खेलते बच्चे

याद आता है पुराना जमाना

यह कविता बचपन की उन सरल और सच्ची यादों को जीवंत करती है, जब नानी का गाँव, चूल्हे की रोटी, नीम की छाँव, पाठशाला के संस्कार और बिजली जाने पर चिमनी की रोशनी जीवन का हिस्सा थे। “याद आता है पुराना जमाना” सिर्फ स्मृतियों का वर्णन नहीं, बल्कि उस सादगी, अपनापन और संस्कारों की दुनिया की भावनात्मक पुनर्स्मृति है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं पीछे छूट गई है।

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