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जयपुर में राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान का भव्य सम्मान समारोह

जयपुर में लेखनी का महाकुंभ

जयपुर में 20 फरवरी 2026 को आयोजित राजस्थान लेखिका साहित्य संस्थान का सम्मान समारोह शब्द, सृजन और स्त्री संवेदना का अद्भुत संगम बन गया। समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों को सम्मानित किया गया तथा ‘हौसलों की उड़ान’ सहित कई कृतियों का भव्य विमोचन हुआ।

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अहाना को धर्मेंद्र की दौलत नहीं, ये विरासत चाहिए

मुंबई: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की बेटी अहाना देओल ने एक पुराने इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें पिता की संपत्ति या दौलत में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपने पिता की पहली कार, उनकी फिएट, को विरासत में चाहती हैं। उनका कहना था कि इस कार से जुड़े अनगिनत…

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रोटी की दास्तान

एक पिता जिसने बच्चों के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, वही बुढ़ापे में भावनात्मक उपेक्षा का शिकार हो जाता है। “रोटी की दास्तान” रिश्तों की सच्चाई को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।

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father teaching math to child with broken pens and nervous expressions, funny childhood memory scene

पिता और पढ़ाई

पिता और पढ़ाई का रिश्ता जीवन भर का एक अद्वितीय अनुभव है, जिसमें कभी प्रेम, कभी भय, और कभी हँसी का मिश्रण होता है। एक गणित अध्यापक पिता का अपने बच्चों को पढ़ाने का अंदाज़, उनके पेन खोजने की आदतें, और ‘लाभ-हानि’ के दो थप्पड़ों की यादें, यह सब मिलकर एक घरेलू, आत्मीय और हास्य-व्यंग्य से भरी स्मृति बन जाते हैं। यह संस्मरण न सिर्फ एक पिता की जटिलताओं को दिखाता है, बल्कि उनके भीतर छिपे प्रेम, अनुशासन और अनोखी सोच को भी उजागर करता है

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क्या मैं बहक गई थी…?

मैं बहक गई थी और यह मानने में मुझे कोई अफ़सोस नहीं। जब मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब मेरा पति मुझसे दूर था। उसी खालीपन में एक पुराना प्यार फिर से सामने आया, जिसने मुझे वह अपनापन दिया जो मैं भूल चुकी थी। उस एक सच ने हमारी शादी को तोड़ा नहीं, बल्कि उसे आईना दिखा गया।

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एक कतरा प्यार

वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।

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रेगिस्तान में खड़ी एक पारंपरिक वेशभूषा में महिला, गर्म रेत और धूप के बीच संघर्ष और दृढ़ता का प्रतीक

मरु-स्त्री: मरुस्थल की स्त्री पर मार्मिक हिंदी कविता

मरु-स्त्री” एक ऐसी कविता है जो रेगिस्तान की कठोरता के बीच जीती स्त्री के भीतर छिपी अनकही विरासत और पीड़ा को उजागर करती है। यहाँ प्यास केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक मौन धरोहर है। यह स्त्री रेत की तरह बिखरती नहीं, बल्कि फैलकर अपने अस्तित्व को जीवित रखती है। उसकी हर चाल, हर चुप्पी और हर प्रतीक्षा में संघर्ष, सहनशीलता और जीवन की अदम्य शक्ति झलकती है जो मरुस्थल की सूनी धरती में भी हरियाली की तरह आशा जगाती है

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विनोद कुमार शुक्ल : देह से विदा, साहित्य में सदा

विनोद कुमार शुक्ल भले ही देह से विदा हो गए हों, पर उनकी लेखनी आज भी साँस लेती है। उनके शब्दों की मंत्रमुग्धता पाठक को यह एहसास कराती है कि सच्चा साहित्य कभी समाप्त नहीं होता, वह चेतना में जीवित रहता है।

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गमले में खिले पीले गेंदे के फूल और प्रेम की प्रतीकात्मक हिंदी कविता

जैसा मैंने सोचा था…

कुछ मोहब्बतें फूलों की तरह होती हैं. मुरझा जाती हैं, मगर उनके भीतर एक बीज बचा रहता है. वक्त और इंतज़ार के बाद वही प्रेम फिर किसी सुबह खिल उठता है.

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वो गाँव की कच्ची सड़क…

गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।

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