अबकी बार गणतंत्र परेड में भाग लेंगे ऊंट, घोड़े, कुत्ते और पक्षी

हेमा म्हस्के, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे
इस जगत में बेज़ुबान पशु-पक्षी हमारे लिए भोजन (दूध, मांस, अंडे), कृषि (खेत जोतना), परिवहन (बोझ ढोना), वस्त्र (ऊन, चमड़ा), दवा (अनुसंधान) और भावनात्मक सहारे (पालतू जानवर) जैसे अनेक रूपों में अत्यंत उपयोगी हैं। वे न केवल हमारे जीवन के हर पहलू में योगदान देते हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इतना सब करने के बावजूद, हम उनके प्रति अक्सर बर्बर रवैया अपनाते हैं। यह सच है कि पशुओं पर होने वाले अत्याचार लगातार बढ़ रहे हैं। इन्हें रोकने के लिए कानून भी बने हैं, फिर भी सामाजिक जीवन में हमारे आसपास मौजूद पशु-पक्षियों के प्रति हम न केवल उदासीन रहते हैं, बल्कि कई बार क्रूर व्यवहार करने से भी बाज़ नहीं आते।
इस बार पहली बार देश और दुनिया को यह जानने का अवसर मिलेगा कि ये पशु-पक्षी देश की रक्षा में भी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गणतंत्र दिवस परेड में इस वर्ष कर्तव्य पथ पर बेज़ुबान पशुओं का एक बेहद खास दृश्य देशवासियों को देखने को मिलेगा। पहली बार बड़े स्तर पर पशु-पक्षी इस परेड में भाग लेंगे। ये पशु दस्ते न केवल भारतीय सेना की ताकत का प्रदर्शन करेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि राष्ट्रीय सुरक्षा में उनका योगदान कितना अहम है।
इस विशेष दस्ते में दो बैक्ट्रियन ऊँट, चार ज़ांस्कर पोनी, चार शिकारी पक्षी (रैप्टर्स), भारतीय नस्ल के दस कुत्ते और छह पारंपरिक सैन्य कुत्ते शामिल होंगे। बैक्ट्रियन ऊँटों को हाल ही में लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्रों में तैनात किया गया है। ये ऊँट अत्यधिक ठंडे मौसम और 15,000 फीट से अधिक ऊँचाई पर आसानी से कार्य कर सकते हैं। ये लद्दाख की नुब्रा घाटी में पाए जाते हैं, इनकी पीठ पर दो कूबड़ होते हैं और ये 250 किलोग्राम तक का भार उठाने में सक्षम हैं। कम पानी और चारे में भी ये लंबी दूरी तय कर सकते हैं।
26 जनवरी को होने वाली परेड में लद्दाख की दुर्लभ और स्थानीय नस्ल के ज़ांस्कर टट्टू भी शामिल होंगे। छोटे कद के बावजूद ये टट्टू असाधारण सहनशक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं। ये 15,000 फीट से अधिक ऊँचाई और शून्य से नीचे 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में 40 से 60 किलोग्राम भार लेकर लंबी दूरी तय कर सकते हैं। वर्ष 2020 में सेना में शामिल होने के बाद से इन्होंने सियाचिन सहित देश के सबसे कठिन इलाकों में सेवाएँ दी हैं। रसद आपूर्ति के साथ-साथ ये घुड़सवार गश्ती दलों में भी अहम भूमिका निभाते हैं और कई बार एक ही दिन में 70 किलोमीटर तक की दूरी तय करते हैं।
परेड में पहली बार चार शिकारी पक्षी, जिन्हें रैप्टर्स कहा जाता है, भी शामिल होंगे। इनका उपयोग पक्षियों के टकराव से होने वाले नुकसान को नियंत्रित करने और निगरानी के लिए किया जाता है। रैप्टर शब्द लैटिन भाषा के रैपेर से लिया गया है, जिसका अर्थ है “पकड़ना” या “झपटना”। ये मूक योद्धा प्राकृतिक क्षमताओं के ज़रिये परिचालन सुरक्षा को मजबूत करते हैं।
परेड का एक प्रमुख आकर्षण सेना के कुत्ते होंगे, जिन्हें भारतीय सेना के सच्चे योद्धा कहा जाता है। मेरठ स्थित आरवीसी (रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर) केंद्र और कॉलेज में प्रशिक्षित ये कुत्ते आतंकवाद-रोधी अभियानों, विस्फोटक व बारूदी सुरंगों का पता लगाने, ट्रैकिंग, सुरक्षा, आपदा राहत तथा खोज एवं बचाव अभियानों में सैनिकों का सहयोग करते हैं। कई बार इन कुत्तों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सैनिकों की जान बचाई है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सेना मुग़ल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बई और राजापलायम जैसी स्वदेशी नस्लों को भी बड़े पैमाने पर शामिल कर रही है।
गणतंत्र दिवस परेड में कदमताल करते हुए ये मूक योद्धा याद दिलाएंगे कि देश की रक्षा केवल हथियारों से नहीं होती। सियाचिन की बर्फ़ीली चोटियों से लेकर लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानों तक, इन पशुओं ने मौन रहकर भी मज़बूती से अपना फर्ज़ निभाया है।

Bahut hi khubsurat lekhan ,sirshak sab haal keh jata hai per pura vivran lazawab tha.likhate rahiye