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आंख मारने की कला

अनुपम नीता बरडे, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) मैं उस शख़्स को शाष्टांग दण्डवत करता हूँ जिसने पहले पहल “आँख मारने ” की कला विकसित की ! ज़रा आप ही सोच कर देखिये कि इस छोटे से , सरल से “संकेत” से कितना बड़ा “संदेश” , पलक झपकते ही दूसरी ओर चला जाता है और मैं…

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माएं कभी बूढ़ी नहीं होती, बस हम बदल जाते हैं

माएं कभी बूढ़ी नहीं होती

माएं कभी बूढ़ी नहीं होतीं, उनकी उम्र भले ही बढ़ जाए, लेकिन ममता हमेशा जवान रहती है. जिस मां ने अपना पूरा जीवन बच्चों की परवरिश में समर्पित कर दिया, वही मां एक समय ऐसा भी देखती है जब उसकी चिंता बच्चों को बोझ लगने लगती है. यह लेख उसी बदलते रिश्ते की सच्चाई और मां के त्याग को गहराई से महसूस कराने की एक संवेदनशील कोशिश है.

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कर्म की सीख…

सफलता आस्था को और प्रबल कर देती है . पंडित जी ने दोनों के जन्मांक देखें और पहले लड़के से कहा – कि वह इस बार अवश्य अधिकारी बन जाएगा और दूसरे लड़के से कहा- तुम्हारे ग्रह नक्षत्र कमजोर हैं, इसलिए तुम्हें किसी अन्य व्यवसाय पर ध्यान देना चाहिए.
१० वर्ष की आस्था भविष्य के आकलन को समझ नहीं पाती, परंतु वह दादा से कहती है कि मेरे विद्यालय में यह बताया जाता है, कि परिश्रम से भाग्य बनता है .आप सभी को परिश्रम से विमुख क्यों कर रहे हो?

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मंदिर में हाथ जोड़कर प्रार्थना करता भक्त, पीछे जलते दीपक और दिव्य प्रकाश

प्रभु का प्रसाद

“प्रभु का प्रसाद” एक सुंदर भक्ति कविता है जिसमें ईश्वर से आशीर्वाद, प्रेम, सुख और मंगल विचारों की कामना की गई है। यह रचना मानव जीवन में भक्ति, करुणा और सकारात्मकता का संदेश देती है।

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तीज का त्यौहार

सावन की रिमझिम फुहारों और काली घटाओं के बीच जब मोर नाचने लगते हैं, तो प्रकृति का हर रंग और स्वर एक अलग ही उमंग लेकर आता है। ऐसे ही मौसम में तीज का पर्व गाँव-गिरांव से लेकर शहरों तक उल्लास फैलाता है। बिटिया की ससुराल कोथली लेकर जाते पिता, माँ-बाबा का स्नेह, पीहर आई बेटियाँ, बचपन की सखियों से मिलन — सब मिलकर सावन को खास बना देते हैं। झूले की पींगे, हँसी की चहक, कजरी की हूक और विरह की टीस — हर भाव इस मौसम में शामिल होता है। धानी चूनर ओढ़े धरती, आमों से लदी अमराई, घेवर की मिठास और मेलों की रौनक मिलकर सावन और तीज के इस त्योहार को यादगार बना देती है।

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रेडियो स्टेशन पर खामोश होते लम्हे

दौर के विविध भारती स्टेशन पर ‘हमारे मेहमान’ कार्यक्रम के लिए रिकॉर्डिंग तो सिर्फ आधे घंटे चली, लेकिन जब फांसी की पुरानी घटना का जिक्र हुआ, तो माहौल एकदम बदल गया। एनाउंसर सुधा शर्मा जी गीत के बीच अचानक मौन हो गईं — “रहे ना रहे हम, महका करेंगे…” गीत की पंक्तियाँ जैसे कमरे की संवेदना में घुल गईं।
जब मैंने 1996 में उज्जैन सेंट्रल जेल में देखी गई फांसी की घटना सुनानी शुरू की, तो सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे रुमाल से आँखें पोंछतीं, लंबी साँस भरतीं और कहतीं, “हां भाई साब, आगे बताइए…”
उनका हर सवाल—“सच में देखा?”, “डर नहीं लगा?”, “नींद आ गई थी उस रात?”—एक गहरी संवेदना और जिज्ञासा से भरा था। इंटरव्यू से ज़्यादा वक्त उस घटना की परतें खोलते हुए बीता।

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नागफनी में फूल

यह कविता नागफनी की रूखी शाख़ पर खिले पहले फूल के दृश्य से आरंभ होती है, जो कवि के भीतर एक गहरी, धीमी लहर की तरह उतरता है। यह दृश्य उसे तुम्हारे श्वेत-श्याम जीवन पर चमकती लाल बिंदी, या बरसों बाद आसमान में उतरे इंद्रधनुष जैसा लगता है। लेकिन कवि सवाल करता है कि तुमने अपने चारों ओर यह कठोर आवरण क्यों बना रखा है, जबकि उसने तुम्हारे भीतर मुस्कान का पहला अंकुर, उसका नन्हा पल और एक सांस लेता हुआ बीज देखा है। वह आग्रह करता है कि इस बीज को बढ़ने, खिलने, फलने का अवसर दो—वरना यह भ्रूणहत्या होगी, चाहे वह भ्रूण नौकरीपेशा ही क्यों न हो, जो काँटों के जंगल में भी फूल की आस रखता है। अंत में, कवि आश्वस्त करता है कि यही बीज नागफनी में भी सुगंध फैला देगा और वह स्वयं, दिल की बाहें फैलाए, उसे समेटने को तैयार है।

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ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…

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मुंबई: जहां हर धक्का सिखाता है जीना

मुंबई का आकर्षण दूर से देखने पर समंदर की लहरों, हैरिटेज इमारतों और तेज़ रफ्तार भागती ज़िंदगियों में नज़र आता है। लेकिन असली मुंबई की पहचान लोकल ट्रेनों की धक्का-मुक्की, जद्दोजहद और संघर्ष में छिपी है। यहाँ हर धक्का इंसान को जीना सिखाता है और हर मुश्किल उसे मज़बूत बनाती है।”

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अच्छी औरत: समाज की सोच, घरेलू हिंसा और एक स्त्री की अनकही कहानी

अच्छी औरत

एक नई दुल्हन, जो कभी घूँघट में सिमटी रहती थी, घरेलू हिंसा, अपमान और जीवन की क्रूर परिस्थितियों से गुजरते-गुजरते ऐसी दुनिया में पहुँच जाती है जहाँ समाज उसे “अच्छी औरत” मानने से इनकार कर देता है। यह मार्मिक कविता केवल एक स्त्री की कहानी नहीं, बल्कि उन सामाजिक मानदंडों पर सवाल है जो परिस्थितियों को नहीं, केवल परिणामों को देखते हैं।

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