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मन की आवाज़ और मुसाफ़िर दिल…

दूर रहकर मुझे ना सताया करो।
बातें ना करके दिल ना जलाया करो।

हूँ अकेली बहुत मैं तुम्हारे बिना,
मेरी सखियों सुनों पास आया करो।

राह जीवन की मेरी किधर जा रही?
जा उधर ये रही या इधर जा रही।

मंज़िले और राहें पता ना मगर,
चैन मिलता वहाँ ये जिधर जा रही।

बनी हूँ मैं मुसाफ़िर अब नहीं मेरा ठिकाना है।
हुई मैं ख़ुद दीवानी हूँ मेरा दिल भी दीवाना है।

भटकती हूँ मैं सदियों से अंधेरों की ही गलियों में,
मैं जुगनू हूँ अंधेरों में मुझे जीवन बिताना है।

आयुषी गुप्ता, प्रसिद्ध कवयित्री, गाजियाबाद

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