सीता चाहिए, तो राम भी बनो
यह कविता समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, एसिड अटैक, महिलाओं के प्रति हिंसा और दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रश्न उठाती है। साथ ही यह पुरुषों को राम और कृष्ण जैसे आदर्शों का अनुसरण कर नारी सम्मान की रक्षा करने का संदेश देती है।

यह कविता समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, एसिड अटैक, महिलाओं के प्रति हिंसा और दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रश्न उठाती है। साथ ही यह पुरुषों को राम और कृष्ण जैसे आदर्शों का अनुसरण कर नारी सम्मान की रक्षा करने का संदेश देती है।
उस शाम का मौन बहुत कुछ कह गया। आपके कहने का इंतज़ार नहीं था मुझे, क्योंकि आपकी नज़रें और आपकी ख़ामोशी ही मेरे दिल तक उतर आई थीं। वह अहसास किसी अनदेखी धारा की तरह मेरे हृदय को छूता चला गया। आसमान पर टिमटिमाते तारे हमारे साक्षी बने और हरसिंगार की महक ने आपके मन की अनकही बात मुझ तक पहुँचा दी। हम आमने-सामने थे, और ऐसा लगा जैसे हमारे दिलों के द्वार सदियों से एक-दूसरे की प्रतीक्षा कर रहे हों। दूर तक फैली चाँदनी ने हमें घेर लिया और हरसिंगार की माला ने हमारी आत्माओं को एक सूत्र में बाँध दिया। उस पल न समय का कोई बंधन था, न दूरी की कोई दीवार—बस आप थे, मैं थी और हमारा गहरा, मौन प्रेम।
थकान भरे दिन के बाद उसका एक मैसेज आया “चाय बनाओ, खिड़की खोलो, और कविताएं लिखो, मानो मैं भी वहीं बैठा हूं।”वो न “आई लव यू” कहता है, न कोई नाटक करता है, फिर भी जाने कैसे सारी थकान मिटा देता है। शायद सच है .उम्र के इस पड़ाव पर प्यार शब्द नहीं माँगता, बस किसी का थोड़ा-सा होना ही काफी होता है।
नवरात्रि हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व आध्यात्मिक शुद्धि, ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। खासतौर पर चैत्र नवरात्रि का महत्व अधिक होता है, जो बसंत ऋतु के साथ नई ऊर्जा और उत्साह लेकर आता है। इस दौरान भक्त पूजा, उपवास, हवन और भक्ति के माध्यम से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार डॉ. प्रमोद कुमार कुश ‘तन्हा’ को उनके ग़ज़ल-संग्रह ‘लकीरों का सफ़र’ के लिए 2026 का विद्योत्तमा साहित्य सुधाकर सम्मान नासिक में भव्य समारोह में प्रदान किया जाएगा।
सुबह की चाय का कप हाथ में लिए मैं अख़बार पढ़ रही थी कि एक खबर ने जैसे दिल को भीतर तक हिला दिया इंदौर में बस में छूटा नवजात शिशु, मां-बाप फरार.
खबर छोटी थी, पर असर बड़ा. कुछ पंक्तियों में लिखी उस घटना के पीछे जाने कितनी कहानियां दबी थीं. लिखा था. एक दंपत्ति बस में सवार हुए, गोद में एक नन्हा सा बच्चा था, मुश्किल से पंद्रह दिन का. थोड़ी देर बाद वे बोले कि कुछ सामान लेना है, बस से उतर गए.
बंगाल की राजनीति पर आधारित यह व्यंग्य सत्ता, हार-जीत, इस्तीफे और राजनीतिक नाटकों की विडंबना को हास्य और तंज के माध्यम से बेहद रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत करता है।
यह कविता कृष्ण-प्रेम की परंपरा में समर्पण, भक्ति और निस्वार्थ प्रेम की एक अंतर्यात्रा है. इसमें राधा और मीरा के प्रतीकों के माध्यम से आत्मा का ईश्वर से संवाद रचा गया है. प्रेम यहाँ भय से परे, सामाजिक रिवाजों से टकराता हुआ भी अडिग रहता है. जब प्रेम का अधिकार न मिले, तब दर्शन, और अंततः स्वयं को बाँसुरी बना देने की चाह यह रचना उसी परम समर्पण की अभिव्यक्ति है.
इस कविता में एक संतान अपनी माँ की यादों और सीख को भावनात्मक रूप में संजोती है। माँ द्वारा दिए गए एक पुराने खत में छिपे भाव उसे आज भी संबल देते हैं। माँ की कही बातें, उसके एहसास, और उसका साथ — सब कुछ आज भी दिल की अलमारी में सजे हुए हैं। वह मानती है कि वह माँ जैसी नहीं बन सकी, लेकिन माँ से जीवन की सच्ची बातें सीखी हैं — मोहब्बत, यारी और कठिनाइयों में टूटे बिना जीना। उजालों की प्रतीक्षा में अंधेरों से जो उसने पाया, वो भी माँ की दी हुई रोशनी से ही संभव हो पाया।