जीवन, प्रकृति और अनुभूति पर आधारित हिंदी कविता “मैं कविता हूँ” का भावात्मक चित्र

मैं कविता हूँ…

मैं कविता हूँ” केवल शब्दों की रचना नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों का स्वीकार है। दुख, सुख, प्रकृति और समय के बीच कविता स्वयं को खोजती और सदा जीवित रहती है।

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श्रीदेवी चश्मे में

मोबाइल और वीडियो गेम से पहले हमारा बचपन माचिस की छापों और फिल्मी पोस्टरों में बसा था। छाप खेलते हुए रेल पटरियों पर खज़ाना ढूँढना, रेयर माचिस पर रौब दिखाना और फिर ताश जैसे पत्तों में दांव लगाना“श्रीदेवी चश्मे में!”ये सिर्फ़ शब्द नहीं, पूरे दौर की धड़कन थे। वह खेल बिना पैसों का था, पर यादों से भरपूर।

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रवींद्रनाथ ठाकुर शांतिनिकेतन के शांत वातावरण में पारंपरिक सफेद वेशभूषा में बैठे हुए, सामने खुली पुस्तकें और पांडुलिपियाँ, गंभीर एवं चिंतनशील मुद्रा में भारतीय साहित्य और दर्शन की गरिमा को दर्शाते हुए।

मानवता के महाकवि : गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और मानवता के अमर स्वर थे। उनका साहित्य आज भी विश्व को प्रेम, संवेदना और विश्वबंधुत्व का संदेश देता है।

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नारी देह, प्रकृति और समाज की दोहरी नैतिकता

यह सशक्त वैचारिक निबंध नारी, देह और समाज की दोहरी मानसिकता पर तीखा प्रश्न उठाता है। गाँव और शहर की स्त्रियों के दृष्टिकोण, सेक्स को लेकर समाज की संकीर्णता और प्रकृति के सहज संतुलन को केंद्र में रखते हुए लेख स्त्री-विमर्श को एक गहरे दार्शनिक स्तर पर ले जाता है।

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प्रोफेसर अजहर हाशमी नहीं रहे

“हर विषय और हर शख्सियत पर जब वे लिखते हैं, तो पढ़ने वाला पढ़ता ही रह जाता है।”
यह पंक्ति प्रोफेसर हाशमी की अद्भुत लेखनी और ज्ञान की गहराई को दर्शाती है, जिससे पाठक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

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समुद्र किनारे अकेला पथिक दूर क्षितिज की ओर देखता हुआ

एक पथिक

“एक पथिक” एक गहन भावनात्मक हिंदी कविता है, जिसमें सागर और पथिक के प्रतीकों के माध्यम से मन की व्यथा, प्रेम, प्रतीक्षा और आत्मसंवाद को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है। यह कविता केवल बाहरी दृश्य का चित्रण नहीं करती, बल्कि भीतर चल रहे भावनात्मक द्वंद्व और एकाकीपन की गहराई को उजागर करती है।

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पर्यावरण संरक्षण के लिए पुणेकरों ने चलायी साइकिल

पुणे: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिवस पर राज्यसभा सांसद प्रा. डॉ. मेधा कुलकर्णी की पहल से आयोजित ‘पुणे ऑन पेडल्स’ साइकिल रैली और वॉकथॉन में हजारों पुणेकरों ने भाग लेकर शारीरिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इस अवसर पर 75 जरूरतमंद बच्चों को साइकिल वितरण भी किया गया।

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पूर्णिमा की रात वृंदावन के वातावरण में बांसुरी लिए कृष्ण और उनके सामने भावपूर्ण मुद्रा में खड़ी राधा, आध्यात्मिक प्रेम और एकात्म का प्रतीकात्मक दृश्य।

राधाकृष्ण: दो नहीं, एक भी नहीं

राधा और कृष्ण के इस काव्य-संवाद में प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मिक एकत्व और समर्पण की अनुभूति बनकर सामने आता है—जहाँ दो अस्तित्व मिलकर राधाकृष्ण हो जाते हैं

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लकीरों और दायरों के पार

लकीरों और दायरों ने हमें अलग करने की कोशिश की, पर हर दूरी में तुम और अधिक मेरी ओर सिमट आईं। जिन दीवारों ने हमें रोका था, वे धीरे-धीरे ढहने लगीं। तुम, जो किसी सैलाब की अमानत थीं, अब अपने भीतर की उफान को थामकर शांत बहने लगीं। और जब होंठों ने चुप्पी साध ली, तब निगाहों ने वह सब कह दिया जो शब्दों में बयाँ न हो सका।

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तुम और मैं : दो छोर, एक डोर

हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।

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