Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
गुलाबी दीवारों वाले हॉस्टल कमरे में बैठी दो युवतियाँ, किताबों और भावनाओं के बीच

गुलाबी दीवारों वाला कमरा

गुलाबी दीवारों वाला वह कमरा दो अनकही ज़िंदगियों का मिलन-बिंदु था, जहाँ बारिश की बूंदों के साथ भावनाएँ भी ठहरती थीं। किताबों, चुप्पियों और साझा क्षणों के बीच अमृता और श्रुति का रिश्ता धीरे-धीरे आकार लेता है—एक ऐसा संबंध जो शब्दों से परे है। समाज की सीमाओं और भीतर के डर के बीच झूलता यह अनकहा प्रेम कभी दूरियों में बिखरता है, तो कभी यादों में सिमट आता है, और अंततः यह एहसास छोड़ जाता है कि सच्चे रिश्ते खत्म नहीं होते वे बस अपना रूप बदल लेते हैं।

Read More
14 घंटे की मेहनत, फिर भी चेहरे पर मुस्कान

अनदेखी नायिका: लक्ष्मी भोइर

यह कहानी है पालघर की लक्ष्मी गोपाल भोइर की, जो पिछले 30 वर्षों से हर दिन सुबह 2 बजे उठकर मंडी से ताज़ी सब्ज़ियाँ लाती हैं और मुंबई में बेचती हैं। 14 घंटे की कड़ी मेहनत के बावजूद उनके चेहरे पर मुस्कान और दिल में संतोष है। यह लेख उन अनदेखी महिलाओं की मेहनत और आत्मसम्मान को उजागर करता है, जिन्हें समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। जानिए एक साधारण दिखने वाली महिला की असाधारण जीवन यात्रा।

Read More
प्रदूषित शहर में झोपड़ी के पास खड़ी महिला धुएँ से भरे आसमान को देखते हुए

ज़हरीली हवाएँ

रीमा धुएँ और धूल से भरे आसमान को निहारते हुए सोचती है—क्या स्वच्छ हवा केवल ऊँची इमारतों में रहने वालों का अधिकार है? झोपड़ियों में रहने वाले लोग भी तो उसी धरती और हवा का हिस्सा हैं। एक नन्हा पौधा उसे उम्मीद देता है कि अगर हम चाहें, तो ज़हरीली हवाओं के बीच भी जीवन को बचाया जा सकता है।

Read More

झंकार में दबा इंतज़ार

पायल और कंगनों की झंकार के बीच प्रेमिका अपने ही मन की उलझनों में बंधी है। आँसू, उदासी और अधूरी चाहत उसे प्रिय से मिलने से रोक रही हैं, और रात चाँद के साथ उसका मौन साक्षी बन जाती है।

Read More

दिल-ओ-दिमाग़

कभी-कभी एक शब्द चुभ जाता है और दिल-दिमाग़ उलझ जाते हैं। लेकिन जब हम खुद को सामने वाले की जगह रखकर देखते हैं, तो समझ आता है कि क्रोध विवेक छीन लेता है और मन को भटका देता है। मानव बने रहने के लिए मन-मानस का तालमेल जरूरी है।

Read More

आँखों की ख़ामोशी

इन आँखों की ख़ामोशी में एक दबी हुई रागिनी है अनकहे शब्दों की, आधी छूटी कहानियों की। चेहरे पर ठहरी शांति और निगाहों में उठते-गिरते समंदर के बीच एक गहरा मंथन छुपा है। ये आँखें जैसे हर सवाल का जवाब अपने भीतर समेटे बैठी हों, मानो कह रही हों कि उन्होंने बहुत कुछ देखा है… पर कहने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।

Read More
सिंदूर से रक्त तक: बदलते रिश्तों पर एक मार्मिक कविता

चरित्र का हनन

प्रेम, विश्वास और रिश्तों की डोर जब छल और स्वार्थ के बोझ तले टूट जाती है, तब केवल दो दिल नहीं बिखरते, बल्कि कई परिवारों की खुशियाँ भी उजड़ जाती हैं। ‘चरित्र का हनन’ कविता आधुनिक समाज में बदलती मानसिकता, विश्वासघात और संवेदनाओं के क्षरण पर एक मार्मिक प्रहार है।

Read More

बिना स्क्रीन का बचपन

बचपन में आम की गुठलियाँ हमारी खुशियों का साधन थीं। महिदपुर रोड की गलियों में बिखरी गुठलियाँ अंकुरित होकर छोटे पौधे बन जाती थीं। हम उन्हें उखाड़कर घर लाते, पत्थर पर घिसते और फूँक मारकर सुनते “बज रहा है या नहीं।” टूटती गुठली पर डाँट और मार भी सहते, फिर अगले दिन फिर से तलाश में निकल पड़ते। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, वह सिर्फ़ खेल नहीं था. धैर्य, लगन और छोटे-छोटे प्रयासों की सीख भी थी, जो अब तक दिल में धीरे-धीरे बजती रहती है।

Read More
आईने के सामने खड़ी एक महिला, जो अपने भीतर के विभिन्न भावों को महसूस कर रही है

मैं मुझमें, मुझमें मैं

“मैं ही उजाला, मैं ही अँधेरा हूँ, मैं ही ख़ुशी, मैं ही दुःख हूँ…”जब इंसान खुद को पूरी तरह स्वीकार कर लेता है,तो उसे किसी और की ज़रूरत नहीं रह जाती. वह खुद में ही एक पूरी दुनिया बन जाता है।

Read More

आजादी का कृष्णपक्ष

आजादी का कृष्णपक्ष**” में कवि स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की उमंग और उल्लास का चित्रण करते हुए हमें याद दिलाता है कि यह आजादी सहज या मुफ्त में नहीं मिली थी। नीति-कुशलता और योजनाओं के बल पर विदेशी शक्तियों ने भारत में अपने पैर जमाए और “सोने की चिड़िया” के घर में लूटपाट मचाई। फूट डालकर शासन करने की नीति ने धर्मों पर संकट और आपसी विभाजन की आग फैलाई।आजादी के स्वप्न देखने वाले वीरों ने प्राणों की आहुति दी, परंतु उन्हें यह आभास भी नहीं था कि स्वतंत्रता के साथ ही देश को बंटवारे का फरमान मिलेगा। इस उपलब्धि में असंख्य जवानियों की कुर्बानी और बंटवारे में छुपी अनेक अनसुनी कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें दुख, करुणा, आतंक और दर्द की गहरी परतें छिपी हैं। विभाजन और विस्थापन के दौरान साथ निभाने वालों ने ही घर-द्वार लूट लिए, मानवता पर पशुता हावी हो गई, हिंसा ने अहिंसा को ढक लिया। कवि आने वाली पीढ़ियों को यह सच्चाई बताने का आग्रह करता है कि भारत नफरत और हिंसा की आड़ में खंडित हुआ।

Read More