जिंदगी भर नहीं भूलेगी मेट्रो की वो रात…

एक भागती-दौड़ती मुंबई की रात में, मैं मेट्रो के सफर पर थी, अपने बैग और गिफ्ट बॉक्स के साथ, साड़ी में शाही अंदाज़ लिए। एक अजनबी सज्जन ने बिना किसी शब्द के मेरी मदद की, मेरा सामान लौटाया और बाद में टिकट लेने में भी सहायता की। हमारी अनौपचारिक बातचीत, मुस्कानें और छोटे-छोटे इशारे उस रात को यादगार बना गए। सफर के बीच हमारी बातचीत इतनी सहज और हल्की थी कि समय का पता ही नहीं चला। उनके व्यवहार में न तो अश्लीलता थी, न कोई लालसा सिर्फ मित्रवतता और आदर।

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अब तो और भारी हो गए मोहन यादव

बिहार चुनाव की सुगबुगाहट शुरु होने से पहले मध्य प्रदेश के मोहन विरोधी नेताओं ने ऐसा माहोल बनाया था कि दिल्ली बहुत नाराज है। सीएम जितनी बार दिल्ली जाते हैं, अमित शाह फटकार लगाते हैं। केंद्र में मंत्री एक नेता ने तो सार्वजनिक मंच से बयान दे डाला था कि किसानों के हितों के लिये मुझे आंदोलन करना पड़ा तो पीछे नहीं हटूंगा। उनका यह बयान इसलिये भी दिल्ली के नेताओं को रास नहीं आया कि मप्र में सरकार भाजपा की ही है तो ऐसा बयान क्यों दिया।

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मोहब्बत

इस अँधेरी रात में बस एक ही ख्वाहिश है ऐसा हमसफ़र मिले, जो टूटे दिल को भी सहला दे और सच के छोटे-से वादे पर पूरी उम्र साथ निभा जाए। मोहब्बत कम भी हो जाए तो चलेगा, पर भरोसे की डोर इतनी मजबूत हो कि ज़िंदगी फिर से खिल उठे। बारिश हो या काले बादल, उसके होने भर से हर पल में सुकून उतर आए।

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थका हुआ व्यक्ति शांत वातावरण में बैठा, सामने हल्की रोशनी के साथ सुकून और ठहराव का प्रतीकात्मक दृश्य

मौत का आलिंगन

यह कविता जीवन के संघर्ष, थकान और मृत्यु के सुकून भरे आलिंगन को गहराई से प्रस्तुत करती है। इसमें दर्द, जिम्मेदारियां और अंततः मिलने वाली शांति का ऐसा चित्रण है, जो पाठक को सोचने और आत्ममंथन करने पर मजबूर कर देता है।

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सूर्यास्त के समय बालकनी में साथ बैठे एक युवा पुरुष और महिला, जो विश्वास और सुकून से भरे रिश्ते का प्रतीक हैं।

अनकहा प्रेम

कुछ रिश्तों को नाम की ज़रूरत नहीं होती। वे विश्वास, अपनापन और खामोशियों की भाषा में जीते हैं। राघव और रिद्धिमा की यह कहानी ऐसे ही एक अनकहे प्रेम की दास्तान है, जहाँ शब्दों से अधिक भरोसा बोलता है।

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टूटता मानव…

मनुष्य आज अपने ही भीतर टूट रहा है। बिना वजह झगड़े पर आमादा है, जबकि जीने की जद्दोजहद पहले से ही कठिन है। कोई शराब और सिगरेट जैसे नशों में डूबा है, कोई जीवन की खुशियाँ खोकर केवल मरने की प्रतीक्षा कर रहा है।

वह अपने दिल में सिर्फ़ दर्द सँजोए बैठा है और खुद को ही ठुकराता जा रहा है। प्यार के रिश्तों में भी उसे छलावा और धोखा मिलता है, जिससे वह गुनहगार-सा महसूस करता है। समाज में झूठ और धोखे का बोलबाला है, सच्चाई का कोई रखवाला नहीं। ऐसे में आदमी सिर्फ़ होशियार होना सीख गया है, संवेदनाएँ खो बैठा है और संघर्षों में हारकर रोने पर मजबूर है।

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नारी कमजोर नहीं – नारी शक्ति और आत्मसम्मान पर आधारित प्रेरक हिंदी कविता

नारी कमजोर नहीं

“नारी कमजोर नहीं” एक प्रभावशाली हिंदी कविता है जो स्त्री की शक्ति, आत्मसम्मान और साहस को उजागर करती है। यह कविता समाज को चेतावनी देती है कि नारी को कमज़ोर समझना सबसे बड़ी भूल है और सम्मान ही उसके अस्तित्व का आधार है।

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गलतफहमियांँ

गलतफहमियांँ… एक ऐसी आग जो बिना लगाए ही सब कुछ भस्म कर देती है। रिश्ते, अहसास, अरमान — सब इसकी चक्की में पिस जाते हैं। अपनों को अपनों से दूर करने वाली यही गलतफहमियांँ, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती हैं।

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कैक्टस

वो कभी तन्हा न लगता है, गमले में भी कितना ख़ुश रहता है… कैक्टस की तरह जो जीवन की हर सख़्ती में भी मुस्कुराता है। न धूप की शिकायत, न छाँव की उम्मीद—बस अपनी मौजूदगी में जीता हुआ एक प्रतीक उम्मीद का।

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बन्द

झुग्गी-झोपड़ी में शिक्षा का दीप जगाने का हमारा छोटा-सा मिशन पूरे जोश में था। नन्हे-मुन्नों के लिए चॉक-स्लेट और कुछ बिस्कुट लेकर मैं घर से निकला तो चेहरे पर मुस्कान तैर रही थी। कारण भी था—कल मेरे अग्रज द्वारा आयोजित बन्द पूरी तरह सफल रहा था। अख़बारों के पन्ने उसी खबर से सजे थे और घर का माहौल सुबह से उसी चर्चा में डूबा था।

अपने परिचित क्षेत्र में पहुँचा तो नज़र नन्हें ननकू पर टिक गई। वह सूनी सड़क को टकटकी लगाए देखे जा रहा था।
“अरे ननकू! क्या देख रहे हो? चलो, पढ़ाई का समय हो गया है।” मैंने पुकारा।ननकू ने बिना आँखें हटाए धीमे स्वर में कहा—
“हमका भूख लागल बा।”

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