
सुरेश परिहार, पुणे
डाकिया… डाक लाया…
यह सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं थी, बल्कि उस दौर की सबसे मधुर धुन थी. जैसे ही मोहल्ले में साइकिल की घंटी बजती और डाकिए की यह पुकार सुनाई देती, घर के आँगन से लेकर चौखट तक उत्सुक निगाहें दौड़ पड़ती थीं्. कोई पिता अपने बेटे के पत्र की राह देख रहा होता, कोई मॉं विदेश गए लाल की कुशल-क्षेम जानने को बेचैन होती, तो कोई युवती अपने प्रिय के ख़त का इंतज़ार करती हुई खिड़की से गली निहार रही होती.
आज के दौर में एक संदेश सेकंडों में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँच जाता है, लेकिन उस समय एक पत्र आने में कई दिन लगते थे. शायद यही वजह थी कि हर ख़त की कीमत समय से नहीं, भावनाओं से आँकी जाती थी. स्याही में घुली होती थीं भावनाएँ..पुराने ख़तों की शुरुआत अक्सर बड़े सलीके से होती थी
परम आदरणीय…
सादर चरण स्पर्श
हम सब यहॉं ईश्वर की कृपा से कुशल-मंगल हैं…
इन शब्दों में केवल औपचारिकता नहीं होती थी, बल्कि पूरे परिवार की धड़कनें बसती थीं्. मॉं की चिंता, पिता की सीख, दादी का आशीर्वाद, बहन की शिकायत और छोटे भाई की शरारतसब कुछ कुछ पन्नों में समा जाता था.
आज की तरह छोटे-छोटे संदेश नहीं, बल्कि हर पत्र अपने साथ कई महीनों का सुख-दुःख लेकर आता था. उसे पढ़ना किसी उपन्यास से कम नहीं लगता था.
पोस्टकार्ड से लेकर लिफ़ाफ़े तक की अपनी दुनिया
पोस्टकार्ड खुला होता था. उसे पढ़ने के लिए किसी पासवर्ड की ज़रूरत नहीं थी. कई बार डाकिया ही उसे पढ़कर सुना देता और पूरा मोहल्ला घर के हालचाल से परिचित हो जाता. फिर भी किसी को बुरा नहीं लगता था, क्योंकि रिश्तों में दिखावा नहीं, अपनापन था.
अंतरदेशीय पत्र तीन तहों में मुड़ा हुआ जीवन होता था. हर तह खोलने के साथ नई भावनाएँ सामने आती थीं्. ऊपर अक्सर लिखा होता केवल… के लिए या गोपनीय . जैसे लेखक चाहता हो कि कम से कम कुछ शब्द तो सिर्फ़ उसी व्यक्ति तक पहुँचें, जिसके लिए वे लिखे गए हैं्.
और जब हाथ में लिफ़ाफ़ा आता, तो दिल की धड़कनें अनायास तेज़ हो जातीं्. उसमें केवल कागज़ नहीं होता था, बल्कि किसी का इंतज़ार, किसी की तड़प और किसी का पूरा संसार समाया होता था.
जब प्रेम ख़त इबादत हुआ करते थे
प्रेम की दुनिया में तो हाथ से लिखा हुआ पत्र किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं था.
रंगीन लेटर पैड, सुंदर लिखावट, इत्र की हल्की-सी खुशबू और शब्दों में छिपा संकोच… यही प्रेम की असली भाषा थी. कई प्रेमी लाल स्याही से लिखते और मज़ाक में लिख देते इसे मेरा ख़ून समझना. कुछ दीवाने सचमुच अपनी उँगली चुभोकर प्रेम-पत्र लिखने की हद तक चले जाते थे.
डाकिए भी इन कहानियों के मूक किरदार होते थे. उन्हें मालूम रहता था कि किस घर में किस दिन किसके नाम पत्र आने वाला है. जब कोई युवक बेचैनी से पूछता…हमारी डाक आई है क्या?…तो डाकिए की मुस्कान ही आधा जवाब दे देती थी.
अगर पत्र मिल जाता, तो चेहरे पर जो चमक आती, वह शायद आज किसी मोबाइल नोटिफिकेशन से कभी नहीं आ सकती.
यादों की सबसे सुरक्षित तिजोरी
उन ख़तों को किताबों के बीच दबाकर रखा जाता था. कभी अलमारी के किसी गुप्त खाने में, तो कभी किसी भरोसेमंद दोस्त के पास्. वे सिर्फ़ कागज़ नहीं थे; वे विश्वास, प्रेम और यादों की सबसे सुरक्षित तिजोरी थे.
आज भी जब दशकों पुराने वे पीले पड़ चुके ख़त हाथ लगते हैं, तो स्याही भले धुंधली हो चुकी हो, लेकिन उनमें दर्ज भावनाएँ आज भी उतनी ही ताज़ा महसूस होती हैं्. जैसे समय रुक गया हो और अतीत फिर से वर्तमान बन गया हो.
तकनीक ने दूरी घटाई, लेकिन इंतज़ार छीन लिया
आज वीडियो कॉल है, सोशल मीडिया है, इमोजी हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है. दुनिया पहले से कहीं ज़्यादा जुड़ी हुई दिखाई देती है. फिर भी कहीं न कहीं संवाद का धैर्य खो गया है.
अब seen और typing… का इंतज़ार है, लेकिन वह बेचैनी नहीं, जो डाकिए की साइकिल की घंटी सुनकर हुआ करती थी. अब संदेश सहेजने के लिए क्लाउड स्टोरेज है, लेकिन अलमारी में रखे उन पुराने ख़तों जैसी आत्मीयता कहीं नहीं्.
मोबाइल बदल जाते हैं, चैट हिस्ट्री मिट जाती है, लेकिन हाथ से लिखा एक पत्र पीढ़ियों तक संभालकर रखा जा सकता है. वह केवल शब्द नहीं, समय का दस्तावेज़ बन जाता है.
आख़िर में…शायद इसलिए आज भी जब कहीं से यह आवाज़ सुनाई देती है… डाकिया… डाक लाया…तो मन अनायास उन गलियों में लौट जाता है, जहॉं नंगे पॉंव भागते हुए दरवाज़े तक पहुँचना ही सबसे बड़ी खुशी होती थी.क्योंकि उस समय डाक सिर्फ़ कागज़ नहीं लाती थी…
वह घर की खुशबू लाती थी.अपनों का स्पर्श लाती थी. किसी का इंतज़ार ख़त्म करती थी. और कभी-कभी…पूरी ज़िंदगी बदल देने वाली एक मुस्कान भी साथ ले आती थी.

जो लिखे वह एहसासों के दस्तावेज थे…. सुंदर पुरानी यादें