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डाकिया डाक लाया

जब मोबाइल और ई-मेल नहीं थे, तब खत ही रिश्तों की धड़कन हुआ करते थे। पोस्टकार्ड से लेकर लिफाफे तक, हर पत्र में सिर्फ़ खबर नहीं, पूरा जीवन लिखा होता था। यह कहानी उसी इंतज़ार, उस स्याही और उन भावनाओं की है, जो आज भी दिल को भिगो देती हैं।

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नीम का पेड़

एक लंबे समय बाद उसी स्टेशन पर उतरते ही यादों की महक मुझे बाँहों में भर लेती है। बचपन की गलियाँ, नीम का पेड़, उड़ती रुई और टूटी-फूटी बस सब मन के भीतर फिर से जीवित हो उठते हैं। मगर जब शहर नए नामों और मॉलों में बदल चुका होता है, तो एहसास होता है कि स्मृतियाँ जहाँ ठहरी थीं, समय वहाँ से बहुत आगे निकल गया है।

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