सिद्धार्थ पारधे : शून्य से शिखर तक

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

आप सभीने “दीवार” फिल्म देखी होंगी !
“इस बिल्डिंग की ईंटें मेरी मां ने उठाई है ” । अब ये बिल्डिंग मैं मेरी मां को तौहफे में देने जा रहा हूं।

अमिताभ का यह डायलॉग भी सुना होगा | सिद्धार्थ पारधे का जीवन भी इसी कहानी से मिलता-जुलता है | यह संघर्ष की एक ऐसी मिसाल है, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगती।बांद्रा पूर्व स्थित कलानगर के पास ‘साहित्य सहवास’ कॉलोनी है | “साहित्य सहवास” कॉलनी विख्यात साहित्यिक आचार्य अत्रे और पद्मश्री अनंत काणेकर जी ने स्थापित की है | जहां ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मानित कवि साहित्यिकार श्री विंदा करंदीकर से लेकर भारतरत्न क्रिकेटर श्री सचिन तेंडुलकर जैसे कई बडे़ – बडे़ व्यक्तिगण और साहित्यिकारों का वास था | साहित्य सहवास कॉलनी की चढाई – घडाई में सिद्धार्थ के माता-पिता का पसीना लगा है , जहाँ उन्होंने अपना बचपन मूलभूत अभावों में गुजारा , आज वे उसी साहित्य सहवास कॉलनी मे खुद का मकान लेकर, वहां के सम्मानित सदस्य हैं। उनकी स्कूल और कॉलेज की पढाई फुटपाथ और झोपड़पट्टी से होकर गुजरी है । सिद्धार्थ , फुटपाथ से निकलकर समाज मे एक प्रतिष्ठित लेखक और समाज सेवक बनने तक का उनका सफर बेहद प्रेरणादायक है।
पेश है उनसे
लाइव वॉयर न्यूज के लिए मधु चौधरी से बातचीत के प्रमुख अंश –

​प्रश्न: सिद्धार्थ जी, आपका बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि काफी संघर्षपूर्ण रही है। कृपया अपने शुरुआती जीवन और मुंबई आगमन के बारे में बताएं।
​सिद्धार्थ पारधे –
मेरा जन्म औरंगाबाद के बुलढाणा तालुका में पिछडे ज्यूट जाती “महार” समुदाय में हुआ, जिसे उस समय समाज में अछूत माना जाता था। मेरे माता-पिता बुलढाणा, जालना और औरंगाबाद के रास्तों पर पत्थर तोड़ने का काम करते थे। सन् 1960 में देश मे सूखे की स्थिति के कारण हम मुंबई आ गए। यहाँ शुरुआत में हम बांद्रा में अपनी मौसी की शास्त्रीनगर की झोपड़पट्टी में रहे, लेकिन वहां से निकाले जाने के बाद हम बेघर हो गए। हमने कलानगर के फुटपाथ पर रातें बिताईं। गरीबी का आलम यह था कि मैं और मेरी बहन भूख मिटाने के लिए रात के समय बांद्रा के गवर्नमेंट कॉलनी मे भिखारियों के साथ शामिल होकर भीख मांगते थे , बचा -खुचा खाना मांगते थे। उस समय फ्रिज नहीं होते थे, तो लोग बचा हुआ खाना किचन की खिडकी से फेंकते थे वह हम ले लेते थे | रोटी को सुखाकर हम कई दिनों तक खाते रहते थे।

​प्रश्न: आपके माता-पिता अनपढ़ थे ,और उनका जीवन संघर्षों से भरा था। ऐसे में आपको पढ़ाई की प्रेरणा कैसे मिली और आपकी शिक्षा की यात्रा कैसी रही?
​सिद्धार्थ पारधे-
यह सब तब शुरू हुआ जब मेरे माता-पिता को कलानगर और बाद में ‘साहित्य सहवास’ कॉलोनी के निर्माण कार्य में मजदूरी करने का काम मिला। मेरे मां-बाप ने साहित्य सहवास कॉलोनी में सभी प्रकार के काम किये |खाडी मे मिट्टी डालने से लेकर साहित्य सहवास कॉलनी बनने के बाद लोगों के घर में बरतन भी मांजे …कॉलोनी बनने के बाद, वहाँ रहने आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों – जैसे अनंत काणेकर, व.पू. काले, आचार्य अत्रे, धर्मवीर भारती, शांता शेलके. विंदा करंदीकर , कई दिग्गज लेखक वहां रहने आये , उनके घरों में मेरी माँ और बहन ने बर्तन धोने और पिताजी माली का काम करने लगे।
मैं वहां के बच्चों के साथ खेलने लगा। मुझे श्री अनंत काणेकरजी ने स्कूल मे भर्ती करवाया, मेरी प्रारंभिक शिक्षा म्युनिसिपल स्कूल में हुई। मैं 10वीं में फेल हो गया था, लेकिन प्रो.विजया राजाध्यक्ष बाई ने मुझे हिम्मत दी और दोबारा परीक्षा देने को कहा। उनके और प्रो.श्रीमती बांदीवडेकर (चेतना कॉलेज) के सहयोग और मार्गदर्शन के कारण ही मैं कॉलेज तक पहुंच पाया। मैंने साहित्य सहवास के बिल्डिंग के टेरेस पर रहकर, लोगों की गाड़ियां धोकर और दूध की बोतलें पहुंचाकर अपनी फीस भरी और ग्रेजुएशन पूरा किया।

​प्रश्न : “साहित्य सहवास” जैसी प्रतिष्ठित कॉलोनी में एक मजदूर परिवार के रूप में रहने का आपका अनुभव कैसा रहा? क्या आपको भेदभाव का सामना करना पड़ा?
​सिद्धार्थ पारधे:
मुझे उस कॉलोनी से सिर्फ प्यार और शिक्षा के लिये प्रेरणा मिली । कॉलनी के मेरे मित्रों की माताओं ने मुझे अपने बच्चों के साथ एक ही थाली में खाना खिलाया और कभी जाति-पाति का भेदभाव नहीं किया।प्रो. विजया राजाध्यक्ष बाई और बांदीवडेकर मैडम ने माँ की तरह मुझे सहारा दिया। सचिन तेंदुलकर के परिवार से भी मुझे बहुत स्नेह मिला। दरअसल, वहां के लोगों ने मुझे सिर्फ पैसे से मदद नहीं की, बल्कि मुझे ‘उंगली’ पकड़कर चलना और पढ़ना सिखाया। उनका भावनात्मक सहयोग ही मेरी असली ताकत बना।

​प्रश्न: जीवन के उन कठिन दिनों की कोई ऐसी घटना जो आपके दिल पर गहरी छाप छोड़ गई हो, जिसने आपको अपमानित किया हो या आगे बढ़ने का हौसला दिया हो?
​सिद्धार्थ पारधे:
एक घटना मुझे आज भी याद है। उन दिनों मेरी कालेज के पढाई के लिए पैसा लगता था । तो किसी के बहकावे में आकर मेरी माँ लोगों के पास पैसे मांगने चली गई। एक घर से सेठाणी ने माँ को पांच रुपये भीख में दिये लेकिन बाद में मुझे सुनाया “तेरी माँ भीख मांग रही थी, तू पढ लिखकर क्या अफसर बनेगा” ?
यह बात मुझे बहुत चुभ गई। उस सेठानी ने मुझे एक अंगुठी दी थी , वह अंगूठी मैंने आज तक उंगली से नहीं उतारी, क्योंकि वह मुझे मेरी पुरानी ‘औकात’ और संघर्ष याद दिलाती है।मेरा मानना है कि आदमी को कुछ भी भूलना चाहिये , लेकिन अपनी औकात कभी नही भूलनी चाहिए | औकात हमको “जमीन” पर ( जीवन के कठोर सत्य) से जोड़कर रखती है |
दूसरी प्रेरणा मेरी माँ की तकलीफ थी | लोगों के घर मे बरतनं और कपडे धो -धो कर
डिटर्जेंट पावडर से मां के पैरों की उंगलियां सड़ जाती थीं, वह रातों को दर्द से रोती थी ,उसके दर्द ने मुझे संकल्प दिया कि मैं एक दिन उसे अच्छा घर दूंगा और काम नहीं करने दूंगा।
तीसरी चीज मुझे चैन से सोने नही देती- मै पढ़ रहा हूं ये बात कुछ लोगों को हजम नही हो रही थी | मेरे इस प्रयास मे, मै मेरी जाति का फायदा नही उठा रहा था | क्यूं कि मेरे पास पिछडी जाति का सर्टिफिकेट नही था | और वह हासिल करने के लिए मुझे समय व्यर्थ नही करना था | उस बात को लेकर एक सेठानी ने मुझसे कहा – “बैसाखी लेके चलने वाले हमेशा बैसाखी के सहारे ही चलते है” | तू उसके बिना कैसे चलेगा? यह बात मेरे दिल को लग गई और मैने कसम खाई की अब मैं बैसाखी के बिना ही कुछ बन के दिखाऊंगा |

​प्रश्न: जिस कॉलोनी को आपके माता-पिता ने अपने पसीने से बनाया, उसी में अपना घर खरीदना किसी सपने के सच होने जैसा है। यह विचार आपके मन में कैसे आया?
​सिद्धार्थ पारधे:
फिल्म ‘दीवार’ का वह डायलॉग—”इस बिल्डिंग की ईंटें मेरी मां ने उठाई हैं”—मेरे दिल के बहुत करीब था। साहित्य सहवास मेरा परिवार था, इसलिए वहां घर खरीदना मेरी प्रचंड इच्छा थी। “बर्निग डिजायर” कहते है ना ! और ……मैंने मेरी कडी मेहनत से शिक्षा पूरी की और एल.आय. सी मे नौकरी मिली …… बहुत दिल लगाकर काम किया । अंततः उसी कॉलोनी में पंडित सत्यजीत दुबे साहब का घर उनकी मृत्यु के पश्चात खरीदा, वह घर मेरे लिए एक ‘माइलस्टोन’ है। उस घर की ईंटें मेरी मां ने उठाई थी | उस घर के कॉलम और दीवारें मेरे माता-पिता ने अपने हाथों से बनाई थीं, इसलिए मैंने उसे आज भी वैसा का वैसा रखा है। आज मैं उसी सोसायटी का एक लेखक मेंबर हूँ।

​प्रश्न: अपनी किताबों और लेखन के बारे में कुछ बताएं। समाज को आप अब क्या संदेश या सहयोग दे रहे हैं?
​सिद्धार्थ पारधे:
साहित्य सहवास लेखकों की कॉलनी है, उसी सहवास में , मैं बडा हुआ हूं | दिग्गज लेखकों को मैने लेखन करते देखा है | तो परिणाम यह निकला कि ,मेरे हाथों में भी कागज- कलम आना ही था | मेरे जीवन के संघर्ष के बारे में मेरी अगली पीढी को पता होना चाहिये इसलिए मैंने मेरे अनुभव कागज पर उतारने का सोचा और मेरे इस संकल्प में, मेरा साथ दिया मेरे मित्र अनिरुद्ध पागे ने, उनकी प्रेरणा से मैंने अपनी आत्मकथा “कॉलनी “ लिखी, जिसे पाठकों का, विशेषकर छात्रों और नेताओं का बहुत प्यार मिला। “कॉलनी “ पांच अन्य भाषाओ मे भी अनुवादित हुई है |
मेरी दूसरी किताब – मेरी माँ के जीवन पर आधारित है | मेरी मां ने साहित्य सहवास कॉलनी मे बहुत बड़े -बडे़ साहित्यिकारों के घरों में काम किया था, मां के नजरिए से बड़े साहित्यिकार अपनी निजी जिंदगीं में कैसे ब बर्ताव करते है ,और मां के जीवन के संघर्षों पर आधारित है।
”मू.पो.१० फुलराणी” मेरी इस किताब को भी साहित्य जगत मे बहुत सराहा गया |
जहाँ तक समाज सेवा की बात है, मैं मानता हूँ कि अगर हम गरीबी से ऊपर उठे हैं, तो हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए। मेरी किताबों की पूरी रॉयल्टी ‘लक्ष्मण भागोजी चैरिटेबल ट्रस्ट’ (मेरे पिताजी के नाम पर) को जाती है, जिससे हम वंचित बच्चों को पढ़ाते हैं। मैं बांद्रा में स्थानीय कई संगठनो का (ALM, एसोसिएशन , फेडरेशन, का सेक्रेटरी हूँ और जम्मू-कश्मीर में ‘बॉर्डरलेस वर्ल्ड फाउंडेशन’ के श्री अधिक कदम के साथ मिलकर अनाथ बच्चियों का पालन पोषण करते है | एंबुलेंस सेवा के लिए काम करता हूँ। मेरी पत्नी भी मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों को पढ़ाती हैं।
मै एल.आई. सी. में डेवलपमेंट ऑफिसर के पद से रिटायर हुआ हूं और मेरा बेटा अमेरिका में रह रहा है|

17 thoughts on “सिद्धार्थ पारधे : शून्य से शिखर तक

  1. यह साक्षात्कार आज की युवा पीढ़ी के लिए बहुत ही प्रेरक है। मानव की आत्मशक्ति उसे कहां से कहां पहुंचा सकती है। मधु जी को बहुत बहुत धन्यवाद।

  2. यह साक्षात्कार आज की युवा पीढ़ी के लिए बहुत ही प्रेरक है। मानव की आत्मशक्ति उसे कहां से कहां पहुंचा सकती है। मधु जी को बहुत बहुत धन्यवाद।

  3. रमेश जी, मैंने आपकी भेजी हुई किताब पढ़ी। इस पुस्तिका मे जो लिखा है, शून्य शिखर तक दिल को छू लेने वाली कहानी है। इस दुनिया और समाज मे रहना बहुत ही मुश्किल है मै आप लोगो को और आपको सलाम करता हु की आपने अपनी जिंदगी मे इतने कस्ट. उठाई है उसमें जीवन की बहुत-सी सच्चाइयाँ समाहित हैं। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि आप जीवन में बहुत ऊँचे शिखर तक पहुँचें और जिस तरह आप समाज में लोगों की सेवा कर रहे हैं, उसी तरह निरंतर आगे बढ़ते रहें। भगवान आपको सेवा के इस मार्ग पर और अधिक शक्ति व ऊर्जा प्रदान करें। और जीवन में आपको जब भी मेरी आवश्यकता है मै आपके लिए खडा रहूंगा एक सच्चा रमेश जैसा मुझे दोस्त मिला भगवान का बहुत आभारी हो कि रमेश जी आप जैसा मुझे अच्छा मित्र मिला
    ॐ सहराम। 🙏

  4. बहुत ही प्रेरणादायक है उनकी जीवन कथा उन्होंने अपने इरादों से जो सफलता प्राप्त की है वह बहुत प्रभावशाली है। उसकी कहानी हम तक पहुंचाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

  5. Wah..madhu very nicely written and d story is such an inspirational to many of us…as it says hard work always pays..

  6. It reminds us of a famous proverb where there is a will there is a way.This is a very inspiring story of Siddhartha Hard work
    is always rewarded

  7. बहुत ही प्रेरणादायक एवं दिल को छू लेने वाला साक्षात्कार है , समाज में सिद्धार्थ जी जैसे बहुत से लोग हैं जो अपनी हिम्मत छोड़ देते हैं पर इस साक्षात्कार को पढ़कर उन्हें प्रेरणा मिलेगी .

  8. This conversation is a commendable effort that reflects deep dedication, patience, and respect for human experience. It reflects the journey Mr Pardhe’s life with honesty and insight, allowing readers to learn from their struggles, achievements, and values. Through careful research and thoughtful narration, you have not only honoured Mr Pardhe but also inspired others by transforming real life into meaningful lesson.

  9. हमारी अगली पीढ़ी को इसे पढ़ना चाहिए, और पढ़कर यह समझना चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में हार ना मानकर, अपने प्रयास जारी रखें…. तो किस्मत भी बदल जाती है।
    आप सभी ने इसे पढ़ा इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। ‌

  10. Very inspiring. Hard work, love and respect for your parents and their work is what today’s children will know from your books. Great motivation for everyone.

  11. इतनी प्रेरणादायक कहानी से हमें परिचित कराने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद मधु। सिद्धार्थ जी की कहानी से हमें सीखने को मिलता है कि जहां चाह है वहां राह है।

  12. The interview of Mr Pardhe’s life story is very inspiring and motivating. Great work by you by sharing such life story of struggle determination and sucess. It is no doubt source of encouragement.

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