डाकिया डाक लाया

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे


डाकिया.. डाक लाया


यह आवाज़ आज भी कानों में गूंज जाती है.एक साधारण-सी पुकार, लेकिन दिल की धड़कन तेज कर देने वाली.
परम आदरणीय,
सादर चरण स्पर्श!
हम सब यहाँ ईश्वर की कृपा से कुशल-मंगल हैं
इन पंक्तियों में स़िर्फ खबरें नहीं होती थीं,
इनमें माँ की चिंता,बाबूजी की सीख,घर की छत की सीलन,
दवा की समयबद्ध गोलीऔर बरसात में भीगते हुए भी बाहर का खाना न खाने की हिदायत सब कुछ समाया रहता था. जब न मोबाइल था, न ई-मेल,तब रिश्ते स्याही में भीगे काग़ज़ों पर सांस लेते थे. पोस्टकार्ड हो तो जैसे पूरा मोहल्ला ही पढ़ ले.डाकिया पढ़कर सुना दे. अरे भैया, घर वाले ठीक हैं, चिंता मत करना.और सुनते ही दिल को सुकून मिल जाए.
अंतरदेशीय पत्र-तीन तहों में लिपटा हुआ जीवन.तीन पन्नों में महीनों का हालचाल.
कभी ऊपर लिखा होता..गोपनीय या स़िर्फ के लिए.ताकि कम से कम कुछ भाव तो सुरक्षित रह जाएँ.और फिर आता था लिफाफा- जिसे हाथ में लेते ही दिल काँप जाता था.क्योंकि उसमें स़िर्फ शब्द नहीं होते थे,पूरी रामकहानी होती थी .रोना, हँसना, शिकायत, मनुहार, प्रेम, डर, उम्मीद. कभी अतिरिक्त टिकट न लगा हो तो
बैरंग की पेनल्टी भी खुशी-खुशी चुकाई जाती थी.
क्योंकि जो लिखा थावह अनमोल था.प्रेमियों के लिए तो खत पूजा से कम नहीं होते थे.रंगीन लेटरहेड,लाल स्याही, इसे खून समझना जैसी पंक्तियाँ और कभी-कभी सचमुच खून से लिखा खत.डाकिए भी सब समझ जाते थे.एक ही पते पर हर हफ्ते,एक ही दिन,एक ही वक्त
डाक देते समय उनके चेहरे की शरारती मुस्कान और रिसीवर की बेताबी चौखट पर खड़ा होकर पूछना- हमारी डाक है क्या?..और अगर डाकिया गर्दन हिला दे. तो दिल जैसे बैठ ही जाए.इन पत्रों को किताबों में छुपाया जाता था, कॉपी के बीच दबाया जाता था,कभी किसी भरोसेमंद दोस्त या सहेली के पास रखवा दिया जाता था.क्योंकि यह काग़ज़ नहीं थे..ये दिल के सबूत थे. आज सब कुछ इंस्टेंट है..मैसेज, कॉल, वीडियो…लेकिन वह इंतज़ार, वह धड़कनवह स्याही की खुशबूवह काग़ज़ की सरसराहट वह सब अब स़िर्फ यादों में है.. और जब भी कहीं से आवाज़ आती है डाकिया डाक लाया..तोदिल एक पल को फिर पुराने आँगन में नंगे पाँव दौड़ जाता है

One thought on “डाकिया डाक लाया

  1. जो लिखे वह एहसासों के दस्तावेज थे…. सुंदर पुरानी यादें

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