रियल लाइफ मर्दानी : मल्लिका बनर्जी
जब नौकरी के नाम पर बच्चे बेचे जा रहे थे और सिस्टम खामोश था, तब IPS मल्लिका बनर्जी ने वर्दी उतारकर अंडरकवर जंग लड़ी. यह कहानी सिर्फ़ बहादुरी की नहीं, भारत में फैली बाल तस्करी की कड़वी सच्चाई की है.

जब नौकरी के नाम पर बच्चे बेचे जा रहे थे और सिस्टम खामोश था, तब IPS मल्लिका बनर्जी ने वर्दी उतारकर अंडरकवर जंग लड़ी. यह कहानी सिर्फ़ बहादुरी की नहीं, भारत में फैली बाल तस्करी की कड़वी सच्चाई की है.
वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा का एक फोटो-क्लिक मीडिया में वायरल होकर खुद एक “ख़बर” बन
गए। राहुल गांधी के दौरे के दौरान उन्होंने जोखिम भरा एंगल लेकर फोटो खींचा, और उसी क्षण उनका यह एक्शन पत्रकारिता के असली जुनून और समर्पण का प्रतीक बन गया जिसे RK स्टूडियोज के प्रसिद्ध लोगो की तरह मध्यप्रदेश की पत्रकारिता का प्रतीक बनाया जा सकता है
सिद्धार्थ पारधे का जीवन हमें सिखाता है कि अगर इरादे मजबूत हों और सही मार्गदर्शन मिले, तो इंसान फुटपाथ से उठकर महलों तक का सफर तय कर सकता है। उनकी विनम्रता, और जमीन से जुड़े रहने की भावना उन्हें बाकी सफल व्यक्तियों से अलग बनाती हैं। उनकी कहानी कंक्रीट के जंगल में संवेदनाओं की जीत की कहानी है।
57 वर्षीय विजया निमला के लिए रनिंग सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि ज़िंदगी का रूपक है। स्लिप डिस्क, फ्रैक्चर और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी शारीरिक चुनौतियों को उन्होंने कभी अपनी मंज़िल के बीच नहीं आने दिया। फैशन डिज़ाइनिंग, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ, समाजसेवा और फिटनेस — इन सभी को सहजता से संतुलित करते हुए उन्होंने यह साबित किया है कि उम्र सिर्फ एक संख्या है। अपने पति राजेंद्र निमला और फिटनेस-प्रेमी बच्चों के साथ उन्होंने जीवन की हर दौड़ में जीत हासिल की है और हर फिनिश लाइन को एक नई शुरुआत में बदल दिया है।
महिदपुर रोड की खुशबू सिद्धार्थ कोचर ने साहस और मेहनत से हाईकोर्ट एडवोकेट बनने का सपना पूरा किया. उनकी यह कहानी महिलाओं के लिए प्रेरणा है.
स्वर्गीय दिनेश चंद्र वर्मा ने पत्रकारिता को सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि धर्म की तरह जिया। उनके लेख, विद्वत्ता और नैतिकता ने स्वतंत्र पत्रकारिता का आदर्श स्थापित किया। उनके व्यापक ज्ञान, गहरी समझ और अखबारों में लगातार प्रकाशित लेख उन्हें पत्रकारिता और साहित्य जगत में अनमोल बना देते हैं।”
उज्जैन के छोटे कस्बे महिदपुर रोड से आई श्वेता बोथरा ने हौसले, दृढ़ निश्चय और लगन से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। महेश भट्ट और अनु मलिक के साथ डेब्यू कर उन्होंने साबित कर दिया कि असंभव कुछ भी नहीं। शिक्षा पूरी करने और मीडिया मैनेजमेंट में एमबीए के बाद श्वेता ने ओरकॉम एडवरटाइजिंग, इंदौर से करियर शुरू किया, लेकिन लेखन का जुनून उन्हें मुंबई ले गया।
उनकी लिखी फिल्म “तू मेरी पूरी कहानी” एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे प्यार और करियर के बीच कठिन निर्णय लेना होता है। श्वेता की कहानी हज़ारों लड़कियों और युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा है—सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए हौसला, मेहनत और जुनून ही सबसे बड़ा हथियार हैं।
महिदपुर रोड के समाजसेवी संतोष विश्वकर्मा (भूरा सेठ), जिन्हें लोग “टेम्पल मैन” के नाम से जानते हैं, अपनी गहरी धार्मिक आस्था और निस्वार्थ सेवाभाव के लिए पहचाने जाते हैं। मंदिरों के जीर्णोद्धार, नवदुर्गा महोत्सव के आयोजन और कांवड़ यात्राओं में उनका समर्पण समाज के लिए एक प्रेरणा है। उनका जीवन संदेश देता है कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें सेवा और विनम्रता का भाव हो।
मेरे लिए पिताजी ही जीवन के पहले शिक्षक थे। उनकी डाँट में करुणा थी और उनकी कठोरता में भी प्रेम छिपा था। उन्होंने केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि सच्चाई, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ जीना सिखाया। अद्भुत संयोग यह रहा कि शिक्षक होकर वे इसी शिक्षक दिवस के दिन इस संसार से विदा हुए—और अपने जीवन से यह अंतिम संदेश छोड़ गए कि सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने आचरण और आदर्श से पीढ़ियों को दिशा देता है।
सालों की नौकरी के बाद जब जोशी जी ने रिटायरमेंट ली, तो सोचा था अब परिवार संग सुखमय समय बिताएँगे। लेकिन हकीकत कुछ और थी—अकेलापन और खालीपन ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। तभी जीवन ने नया मोड़ दिया। पहले गौशाला की सेवा, फिर अस्पताल में मैनेजर की जिम्मेदारी… और यहीं से शुरू हुई उनकी दूसरी पारी। आज वे सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जी रहे हैं, यह साबित करते हुए कि “रिटायरमेंट अंत नहीं, बल्कि नई सुबह की शुरुआत है।”