
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
एक हाथ में संगीत वाद्य और दूसरी बाँह पर स़फेद साड़ी में गिरती हुई स्त्री…यह प्रतिष्ठित मुद्रा राज कपूर की ़िफल्म बरसात (1949) के एक दृश्य से ली गई है. यही दृश्य आगे चलकर आर.के. ़िफल्म्स के लोगो के रूप में अपनाया गया. मुझे लगता है मध्यप्रदेश की पत्रकारिता का भी यह लोगो बना दिया जाए. जो एक पत्रकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा.
पत्रकारिता केवल पेशा नहीं होती, यह एक ऐसा जुनून है जो उम्र, जोखिम और परिस्थितियों की परवाह किए बिना इंसान को ख़बर के पीछे खड़ा कर देता है. जब यह जुनून सिर चढ़कर बोलता है, तब कभी-कभी पत्रकार खुद ही खबर बन जाता है. कुछ ऐसा ही दृश्य तब सामने आया, जब वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा राहुल गांधी के इंदौर दौरे के दौरान फोटो कवरेज करते हुए खुद सोशल मीडिया पर वायरल हो गए.

भागीरथपुरा में मृतकों के परिजनों से मिलने आए राहुल गांधी को कवर करने पहुंचे तमाम पत्रकारों में कीर्ति राणा भी थे. वर्षों की आदतखबर लिखने और मौके का फोटो लेने कीउंगलियों में आज भी वैसी ही खुजली पैदा कर देती है. सामने मौका था, एंगल तय थे, कैमरे तैयार थे. लेकिन राणा जी ने वही किया जो एक जुनूनी पत्रकार करता है. थोड़ा अलग, थोड़ा जोखिम भरा, पर पूरी शिद्दत के साथ. भंगार पड़ी बाइक पर एक पैर, दूसरा छोटी दीवार पर टिकाकर, हाथ में मोबाइलऔर आंखों में वही पुराना जुनून.
उसी क्षण टाइम्स ऑफ इंडिया के फोटो जर्नलिस्ट प्रवीण बरनाले ने कैमरा घुमाया और क्लिक कर दिया. यह क्लिक सिर्फ एक फोटो नहीं थी, यह पत्रकारिता के समर्पण की तस्वीर थी. कुछ ही देर में वह फोटो स्टेट प्रेस क्लब ग्रुप में पहुंची, और फिर देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. कांग्रेस नेता प्रेम खड़ायता, साथी पत्रकार दीपक जैन, शंकर मौर्य सहित कई लोगों ने अपने-अपने कैमरों से ली गई तस्वीरें भेजीं. शाम तक हाल यह था कि राहुल गांधी के दौरे से ज़्यादा चर्चा उस पत्रकार की हो रही थी, जो फोटो लेते-लेते खुद फोटो का विषय बन गया.

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई
खबर के लिए खुद खबर बन गए…जुनूनी पत्रकार….खतरों के खिलाड़ी…इस उम्र में भी नौजवानों सा जोश…फोटो जर्नलिज़्म का असली चेहरा…किसी ने इसे साहस कहा, किसी ने जोखिम, तो किसी ने स्नेह भरी चिंता जताई…इतना रिस्क मत लिया कीजिए, अपना ख्याल रखिए. लेकिन इन तमाम प्रतिक्रियाओं के बीच एक बात साफ थी.
कीर्ति राणा की पत्रकारिता लोगों के दिलों को छू गई थी. वरिष्ठ पत्रकारों ने इसे पत्रकारिता की असली पहचान बताया. जनसंपर्क विभाग में वर्षों काम कर चुके अधिकारियों ने कहा कि यदि पत्रकार के भीतर फोटोग्राफर भी हो, तो वह उसके लिए वरदान है.. बशर्ते एंगल सही हो और नीयत साफ.

यह घटना हमें याद दिलाती है कि सच्ची पत्रकारिता सुविधाओं की मोहताज नहीं होती. कभी महंगे कैमरे होते हैं, कभी सिर्फ मोबाइल पर अगर भीतर आग है, तो खबर खुद रास्ता बना लेती है. कीर्ति राणा का यह एक्शन…इसी आग का नाम है.
आज के समय में, जब पत्रकारिता पर सवाल उठते हैं, तब ऐसे दृश्य उम्मीद जगाते हैं. यह साबित करते हैं कि अब भी ऐसे लोग हैं, जिनके लिए पत्रकारिता व्यवसाय नहीं, जीवन का धर्म है.वाकई जो मौके पर हो और उंगलियों में खुजली न हो, वो पत्रकार ही क्या? कीर्ति राणा जैसे जुनूनी पत्रकारों को सलाम. उनका यह एक्शन मीडिया जगत लंबे समय तक याद रखेगा.

अद्भुत
वाह !
Really nice work
बेजोड़ पत्रकार हैं कीर्ति,उनके जुनून का मै साक्षी रहा हु,1980/81से, वो खबरों के राणा हैं,बिना चेतक के जुनून पर सवार हो जाते हैं…