तुम्हारे चश्मे और मेरी हसरतें…
तुम्हारी उन काजलभरी आँखों पर जब तुम चश्मा लगाती हो न…मुझे लगता है, हमारे बीच एक काँच की दीवार खड़ी हो जाती है।मैं चाहता हूँ इन आँखों में अपना अक्स साफ़ उतरते देखूँ,और ख़ुद पर रश्क कर सकूँ।

तुम्हारी उन काजलभरी आँखों पर जब तुम चश्मा लगाती हो न…मुझे लगता है, हमारे बीच एक काँच की दीवार खड़ी हो जाती है।मैं चाहता हूँ इन आँखों में अपना अक्स साफ़ उतरते देखूँ,और ख़ुद पर रश्क कर सकूँ।
वो दिवाली, जिसमें दीपक छोटे थे, पर हमारी खुशियाँ बहुत बड़ी। जिसमें घर की सफाई भी खेल थी, और कबाड़ में से गुम चीज़ मिल जाना किसी खजाने से कम नहीं। जिसमें पटाखों की आवाज़ें नहीं… हमारी हँसी की गूँज ज़्यादा थी।जिसमें मिठाईयों की खुशबू थी, और त्योहारों में सजे संस्कार। वो दिवाली… जो परंपरा के साथ हमारी मासूमियत को भी रोशन कर देती थी।
बुढ़ापे में अकेलेपन से लड़ते-लड़ते थक चुके थे दोनों। बच्चे अपनी दुनिया में चले गए थे। सुबह की वॉक में बस हल्की सी “नमस्ते” होती थी. लेकिन उसी छोटी-सी मुस्कान ने भीतर कहीं एक गहरी पहचान बना दी थी। फिर धीरे-धीरे चाय, ग़ज़लें, खाना, बीमार पड़ने पर ख़याल… और एक दिन एहसास हुआ. हम तो एक-दूसरे के सहारे फिर से जीना सीख गए हैं।प्यार कभी उम्र नहीं देखता।
कभी देर से ही सही . पर सच्चा साथ मिल जाता है।
हाँ, मैं मधुशाला जाता हूँ। अपनी सुध-बुध मिटाने, मृगतृष्णा जैसे सपनों को थोड़ी देर छू लेने, थोड़ा बुदबुदा कर मन की गाँठें ढीली करने और अपने ही दिल को समझाने के लिए। कड़वी बातें जब अंदर लंबी चुभन बनकर रह जाती हैं और हँसी की गुंजन भी फीकी पड़ जाती है.तब बस थोड़ी नई ऊर्जा जुटाने को मैं वहाँ जाता हूँ। मैं नादान भी नहीं हूँ और न पागल, न ही कोई भटका हुआ आदमी। दूसरों की सभी बातें सुनकर भी अपने असली ज़ख्म तो दिल में ही रखता हूँ और इन्हीं घावों की आवाज़ सुनने के लिए भी मैं मधुशाला जाता हूँ।
प्रसव के बाद थकी-हारी गीतू मायके से किसी के आने की उम्मीद लगाए चिंतित है। आर्थिक तंगी और दूरी के कारण उसे लगता है कि कोई नहीं आएगा। मन में यह भी कसक है कि काश बेटी होती तो पिता का बोझ हल्का होता। तभी सासू माँ फोन पर सबको खुशी से बेटे के जन्म की खबर देती हैं और मालिशवाली को बुलाकर कहती हैं — सवा महीने बाद बड़ा फंक्शन होगा। गीतू अपनी चिंता बताती है कि मायके से सोना-चांदी आदि कैसे आएंगे, तो सास lovingly कहती हैं — “सोना-चांदी तो दादा-दादी की ओर से आएगा, तुमने हमें पोते के रूप में खरा सोना दिया है।” यह सुनकर गीतू भावुक होकर अपनी सास से लिपट जाती है अपनी दूसरी माँ की तरह।
पानी ठंडा हो तो जमा कर दे, गर्म हो तो जला दे।
ज़्यादा हो तो डुबो दे, कम हो तो प्यास से मार दे।
मैला हो तो बीमारी दे, आँखों में हो तो आँसू बन ए,
और शरीर से बहे तो मेहनत की बूंद कहलाए।
जयपुर में किराये के घर के नीचे रहने वाली 80-85 साल की अम्माजी ने मुझे दोस्त बना लिया था। हिसाब-किताब में पक्की, आवाज़ में रौब — और उम्र में अद्भुत ताक़त। बेटियाँ पास थीं, बेटा विदेश में पर उनके मन में सबसे बड़ी खाली जगह बेटे ने ही छोड़ी थी। वह मुझे बहाने से बुलातीं, गाने सुनातीं, और कहतीं “बात कर लिया करो, अच्छा लगता है।”
दिवाली से ठीक पहले वह बाथरूम में गिर गईं। ऑपरेशन हुआ। बेटियाँ दौड़-भाग में, और एक्सरसाइज़ मेरा काम। irritation भी होती थी, पर उनसे मोह भी हो गया।
हम इस देश में असल मुद्दों पर बात करना पसंद नहीं करते। हमें झंझट पसंद नहीं, इसलिए टूटी सड़कों, मिलावट वाले खाने, बढ़ते कंक्रीट, बिजली-पानी की किल्लत तक सब सहते जाते हैं। भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ती रहे, पर्चे बिकते रहें, कूड़े के पहाड़ बन जाएँ फिर भी फर्क नहीं पड़ता। हम तमाशा देखते रहते हैं। असल में हमें मुद्दे नहीं, आराम चाहिए। यही वजह है कि हालात बदलते नहीं और हम भी नहीं।
ह की देहरी लांघकर तुम कभी मुझ तक नहीं आ पाओगे। मैं केवल बाहर से दिखाई देने वाला शरीर नहीं हूँ, मैं सिर से पाँव तक, बाहर से भीतर तक सम्पूर्ण हृदयवत हूँ। इस शरीर के खोल की दीवारें मैंने कछुए जैसी मजबूत बनाई हैं। यह बदन भोग्य नहीं, यह एक मंदिर है, जिसमें मैंने स्वयं की प्रतिमा स्थापित की है और उस द्वार की प्रहरी मैं स्वयं हूँ।
माँ होना जैसे मेरा सबसे बड़ा अपराध बन गया। हर कोई मेरे किरदार को अपनी-अपनी सुविधानुसार तराशता रहा। किसी ने कभी नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ .क्या चाह कर जियूँ, कैसे जीना चाहूँ। सबने सिर्फ़ अपने अपने फैसले मेरे ऊपर रख दिए। सवाल, ताने, धारदार जजमेंट सब मुझ पर ही बरसते रहे। मेरी अपनी छोटी-सी चाहत, अपनी-सी ज़िंदगी… कब छूट गई, मुझे याद भी नहीं। बस इतना समझ आया है कि मैं कहीं रास्ते में ही पीछे रह गई और “मैं” का वो छोटा-सा किस्सा, बहुत पहले तमाम हो चुका है।