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चाहत

कई वर्षों तक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी मेरी पढ़ाई की इच्छा आज फिर से सिर उठाने लगी है। उम्र पचास पार कर चुकी है, पर मन में अभी भी उम्मीद की लौ जल रही है। कभी मेधावी छात्रा रही मैं, जीवन की उलझनों में खुद को कहीं खो बैठी थी। कर्तव्य और परिवार ने हमेशा पहला स्थान पाया, और मेरी इच्छाएँ पीछे छूटती गईं।

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किसी की आहट… कोई तो है

रात की नीरवता में मन बार-बार किसी अज्ञात उपस्थिति को महसूस करता है. जैसे कोई अदृश्य कदमों से मन के आँगन तक आ पहुँचा हो। पहचान स्पष्ट नहीं, पर एहसास गहरा है। कोई है… जिसकी आहट, जिसकी परछाईं, जिसकी अनकही मौजूदगी दिल को बेचैन भी करती है और आकर्षित भी। मन बार-बार उसी ओर खिंचता है.

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मतलबी रिश्तों की चुभन

मतलबी रिश्ते अक्सर शुरुआत में बहुत मीठे लगते हैं, लेकिन समय के साथ उनकी परतें उतरने लगती हैं। लोग साथ तो देते हैं, लेकिन उनके कदमों के पीछे सुविधा छिपी होती है। वे मुस्कुराते ज़रूर हैं, पर मुस्कान में अपनापन नहीं. ज़रूरतों की परछाई बसती है। जब तक आप उनके काम आते हैं, वे आपके साथ रहते हैं; और जिस दिन आपका उपयोग समाप्त होता है, दूरी बढ़ने लगती है। ऐसे रिश्ते दिल तोड़ते हैं, लेकिन आँखें खोलना भी सिखाते हैं क्योंकि सच्चे लोग कम होते हैं, और वही जीवन के सबसे सुंदर किनारे होते हैं।

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रंग–रंग में बसा जीवन

जीवन को रंगों ने हमेशा ही नए अर्थ और नई दिशा दी है। लाल रंग माँ की बिंदी की तरह स्नेह और खुशियों का संदेश देता है, हरा रंग धरती की हरियाली बनकर मन में शीतलता और समृद्धि का भाव जगाता है। नीला रंग आसमान की तरह मन को उड़ान और शांति दोनों देना जानता है, जबकि सफ़ेद रंग सरस्वती की पवित्रता में ज्ञान और सादगी का प्रतीक बन जाता है। भगवा रंग सनातन संस्कृति की जड़ से जोड़कर जीवन में अनुशासन और संस्कारों का उजास भरता है। हर रंग अपनी अलग महिमा लिए हुए है और हर रंग जीवन को किसी न किसी रूप में सम्पन्न और सार्थक बनाता है।

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उड़ चलें फिर से मासूम पंखों पर

बचपन वह उम्र है, जब दुनिया का कोई ग़म साथ नहीं चलता। मासूमियत इतनी गहरी होती है कि हर डाँट भी प्यार लगती है और हर शरारत में एक बेफ़िक्री छुपी रहती है। बच्चे न गीत के सुर जानते हैं, न जिंदगी की डर-फिक्र फिर भी सबसे मधुर धुन वही गा लेते हैं। किसी पत्थर को उछालते हुए भी हँस देना, किसी अजनबी से भी अपना-सा रिश्ता बना लेना, यही उनकी अलमस्त दुनिया का जादू है।

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मासूम मुस्कानें

वो दिन कितने सुहाने थे. जब तुम छोटे-से बच्चे थे। खेलते–कूदते हुए हँसते-हँसते मेरी गोदी में चढ़ आते और मिट्टी में खेलकर अपने गालों पर रंग-सा बिखेर लेते। तुम्हारी वह मुस्कान मानो चारों ओर गुलाल-सी छा जाती। मैं तुम्हें गले लगाकर झूला झुलाती, और तुम्हारे लाड़-प्यार से घर में मानो खुशियों के मोती बिखर जाते। दौड़ते-दौड़ते जब तुम थककर मेरी बाँहों में सो जाते, तो लगता जैसे दुनिया की सारी शांति मुझे मिल गई हो।

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एक प्रश्न

शर्मा जी ने जीवन की पूरी कमाई दो बेटों में बाँट दी, पर बदले में एक कमरा तक न मिला। किराए के मकान में रहने वाले शर्मा जी सुबह का खाना बड़े बेटे और शाम का खाना छोटे बेटे के यहाँ खाकर लौट आते। यह दिनचर्या उनके दस वर्षीय पोते निखिल से छिपी नहीं थी। एक दिन वह मासूमियत से पूछ बैठा. “पापा, जब आप बूढ़े हो जाएँगे… तो दूसरे वक्त का खाना कहाँ खाएँगे

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अशुद्ध जल सप्लाई : एसडीएम ने मामला किया खारिज

नगर पालिका परिषद नागदा द्वारा शहर को लगातार आठ दिनों तक मटमैला, मिट्टीयुक्त और अशुद्ध जल सप्लाई किए जाने की स्वयं की लिखित स्वीकारोक्ति सामने आने के बाद भी एसडीएम द्वारा प्रकरण को आंशिक आपत्ति स्वीकार कर खारिज कर देना पूरे शहर में गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. आवेदक अभय चोपड़ा ने इस निर्णय को सत्ताधारी दल के दबाव में लिया गया बताते हुए कहा कि यह सीधे-सीधे जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 151 से 164 के अंतर्गत दंडनीय अपराध बनता है.

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महिला काव्य मंच की मासिक काव्य गोष्ठी सम्पन्न

महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई द्वारा 14 नवम्बर 2025 को ऑनलाइन मासिक काव्य गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया. कार्यक्रम बाल दिवस के उपलक्ष्य में समर्पित रहा, जिसमें बचपन, मासूमियत, संस्कार, स्मृतियों और जीवन मूल्यों पर आधारित अनेक भावपूर्ण व विविध विधाओं की रचनाएँ प्रस्तुत की गईं. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. ऊषा चौधरी, अध्यक्ष उत्तर प्रदेश मध्य (मकाम) तथा विशिष्ट अतिथि नोरिन शर्मा, सचिव पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मकाम) रहीं. गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. राजेश कुमारी (राष्ट्रीय अध्यक्षशिक्षा मंच एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मकाम ने की.

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अधूरी बात, अधूरा जीवन…

शारीरिक बीमारियों का इलाज तो हम कर लेते हैं लेकिन वह बीमारियां जो दिमाग के अंदर ही अंदर पनपतीं रहती हैं, किसी को दिखाई नहीं देती है, सही समय पर उनको पहचान कर, स्वीकार करना और इलाज ना किया जाए तो उनका रूप किस कदर बिगड़ेगा …..
विवेक की मानसिक स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी ।‌ मां को लेकर वह असुरक्षित महसूस करता था । अपनी बात ना मां को ना किसी और को समझा पाया ।
मां उसकी इस बीमारी को समझ तो रही थी लेकिन इससे पहले कि वह इलाज ढूंढती …..

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