* नागदा नगर पालिका पर जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ का गंभीर आरोप
*दोषियों पर बीएनएस के तहत केस दर्ज करने की उठी मांग

नागदा जं. से लाइव वॉयर न्यूज के लिए अभय चोपड़ा की रिपोर्ट
नागदा, 15 नवंबर
नगर पालिका परिषद नागदा द्वारा शहर को लगातार आठ दिनों तक मटमैला, मिट्टीयुक्त और अशुद्ध जल सप्लाई किए जाने की स्वयं की लिखित स्वीकारोक्ति सामने आने के बाद भी एसडीएम द्वारा प्रकरण को आंशिक आपत्ति स्वीकार कर खारिज कर देना पूरे शहर में गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. आवेदक अभय चोपड़ा ने इस निर्णय को सत्ताधारी दल के दबाव में लिया गया बताते हुए कहा कि यह सीधे-सीधे जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 151 से 164 के अंतर्गत दंडनीय अपराध बनता है.
जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा से खिलवाड़
नगर पालिका के पदेन सीएमओ ने माननीय न्यायालय को लिखित रूप से स्वीकार किया है कि आठ दिनों तक अशुद्ध व मटमैला पानी सप्लाई हुआ, लेकिन जल शोधन प्रक्रिया, एलम, क्लोरीन और ब्लीचिंग के उपयोग का कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया. प्रतिदिन के जल परीक्षण की लैब रिपोर्ट, केमिस्ट की योग्यता और तकनीकी स्टाफ की तैनाती जैसी महत्वपूर्ण सूचनाएं भी पत्र में छुपाई गईं. यह स्वीकारोक्ति स्वयं प्रमाणित करती है कि नगर पालिका द्वारा स्वीकृत जल शोधन विधि का पालन नहीं किया गया, जो सीधे जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा के खिलाफ अपराध है.
जिम्मेदारों ने झाड़ा पल्ला
प्रकरण में और गंभीरता तब बढ़ गई जब जलकार्य समिति के पदेन अध्यक्ष ने न्यायालय को दिए जवाब में कहा कि मेरे पास इस प्रकरण में कोई अधिकार नहीं है, इसलिए मुझे मुकदमे से अलग किया जाए.जबकि वास्तविक कानूनी स्थिति यह है कि जलकार्य समिति का अध्यक्ष जल प्रदाय, जल शोधन, निरीक्षण और गुणवत्तापूर्ण पानी वितरण का प्रमुख जिम्मेदार होता है. ऐसे में जनता के समक्ष शुद्ध पानी का झूठा प्रचार करना और न्यायालय में जाकर अधिकारहीनता का दावा करना स्पष्ट विरोधाभास है.
इस पर आवेदक अभय चोपड़ा ने कहा यह पदीय कर्तव्यों से बचने का प्रयास है और न्यायालय को भ्रमित करने की श्रेणी में आता है. सीएमओ की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे हैं. नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना उनका व्यक्तिगत वैधानिक दायित्व है. अशुद्ध जल सप्लाई करना न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि बीएनएस और सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत भी गंभीर दंडनीय अपराध है.
आवेदक के अनुसार एसडीएम द्वारा नगर पालिका की आपत्तियाँ स्वीकार कर प्रकरण को खारिज करना न तो विधिक रूप से उचित था और न ही न्यायसंगत. नगर पालिका की आपत्तियों का कोई कानूनी आधार नहीं था, क्योंकि न्यायालय के आदेश को उसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती. अशुद्ध जल सप्लाई की स्वीकारोक्ति होते हुए भी प्रकरण खारिज करना कानून के खिलाफ है. चोपड़ा ने दावा किया कि यह निर्णय पूरी तरह राजनीतिक दबाव में लिया गया प्रतीत होता है.
आवेदक ने माँग की है कि नगर पालिका नागदा के जिम्मेदार दाधिकारियों पर बीएनएस के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए, जल शोधन प्रक्रिया व रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच हो, जल परीक्षण एवं शोधन की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग अनिवार्य की जाए, सेटल टैंक निर्माण पर स्थायी आदेश दिए जाएँ और उपखंड अधिकारी द्वारा जनसुनवाई में की गई निरीक्षण रिपोर्ट को प्रकरण का हिस्सा बनाया जाए.
… तो मजबूरन कानूनी लड़ाई लड़नी होगी
यदि प्रशासन जनस्वास्थ्य जैसे गंभीर विषय में भी राजनीतिक दबाव में कार्य करेगा, तो हमें दोषी पदाधिकारियों और अधिकारियों पर भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत कठोर आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने की कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी.
-अभय चोपड़ा (सामाजिक कार्यकर्ता)
