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राही राज़ को साहित्य सम्मान और प्रीति राही को संगीत सम्मान

श्री सिद्धार्थ सांस्कृतिक परिषद का वार्षिक उत्सव बिहार भवन, बैंगलोर में हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले गणमान्य व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। राही राज़ को साहित्य सम्मान और प्रीति राही को संगीत सम्मान प्राप्त हुआ।

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गधे पैदा नहीं होते, बनाए जाते हैं…

अगर आप सोचते हैं कि बिना मेहनत के मोटी कमाई संभव नहीं तो जनाब आप गलत हैं। पेश है “बाबा मेकिंग कंपनी प्रा. लि.” का बेमिसाल मॉडल, जहाँ थोड़ी वाकपटुता, थोड़ी झूठ बोलने की कला और चमत्कार बेचने का हुनर आपको रातों-रात ‘दी ग्रेट बाबा’ बना सकता है। लाखों गधे आपका इंतजार कर रहे हैं जो आंख मूंदकर आपके ‘चमत्कार’ पर भरोसा करेंगे। बस दस हज़ार रुपये निवेश कीजिए और करोड़ों में खेलिए। धर्म, चमत्कार और गधों की दुनिया में आपका स्वागत है!

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शिव

यह कविता शिव महिमा का अनुपम वर्णन है, जिसमें सदाशिव की अनंत महिमा, करुणा, दया और प्रेम का भावपूर्ण चित्रण किया गया है। शिव केवल तीनों लोकों के स्वामी ही नहीं बल्कि भक्तों के उद्धारक भी हैं। डमरू की ध्वनि से गुंजित, दूध और जल की धार से पूजित, सदाशिव का प्रत्येक रूप श्रद्धा से भरा हुआ है। शिव शंभू न केवल काशी के वासी हैं बल्कि हर कण में विद्यमान हैं। उनका भस्म रमाया रूप, सर्पों का हार, नंदी पर विराजमान स्वरूप—सभी जीवन के हर क्षण में शांति और शक्ति का संचार करते हैं।

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इंदौरियत जिंदा है…..

इंदौर ने स्वच्छता में लगातार आठवीं बार पहला स्थान पाकर यह सिद्ध कर दिया है कि जब नागरिक जागरूक हो जाएं तो कोई लक्ष्य असंभव नहीं। जहां देश के कई शहरों में सफाईकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहीं इंदौर में उन्हें हार पहनाकर सम्मानित किया जा रहा है। यह सिर्फ स्वच्छता की जीत नहीं, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता की जीत है। इंदौर ने साबित किया है कि शहर की खूबसूरती केवल सड़कें नहीं, बल्कि वहां के लोगों का दिल भी होता है।

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सुनो पलाश …

हर साल फरवरी में पलाश जब अनंत से उतरकर मेरे छत की मुंडेर तक खिल जाता था, तब कुछ भीतर गुनगुनाने लगता था। ज्वालामुखी से दहकते फूलों की गरमी मेरी उँगलियों तक दौड़ जाती थी। किताबें बेअसर हो जाती थीं, मन मुंडेर पर टिक जाता था, और अम्मा की डांट भी उस खींचाव को रोक नहीं पाती थी। तब नीले स्कर्ट की सुनहरी किनारी घुटनों तक फहराती थी और गालों पर सिंदूरी रंग अपनी पहली होली खेलने लगता था। साल दर साल फरवरी आती रही, लेकिन आज कपोल रक्तहीन हो गए, स्कर्ट बीते दिनों की बात बन गई, और अम्मा की डांट एक स्मृति। लेकिन मन अब भी चाहता है कि पलाश लौटे, फिर एक बार मुंडेर तक झुके, फिर से होरी से पहले होली खेली जाए।

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एक प्याली चाय… और पीछे छुपा पूरा असम

“भारत की आत्मा अगर विविधता है, तो उसकी सांसों में जो सुगंध बसी है वह है चाय की खुशबू। हर सुबह की शुरुआत, हर शाम की थकान, दोस्तों की हंसी और दफ्तर की भागदौड़—इन सबके बीच कहीं न कहीं असम की मिट्टी और मेहनत की खुशबू घुली होती है। असम की ब्रह्मपुत्र घाटी की उर्वर मिट्टी और मेहनती मजदूरों की तपस्या से निकली हर चाय की चुस्की सिर्फ स्वाद नहीं, एक संस्कृति, संघर्ष और सम्मान की दास्तान सुनाती है।”

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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क्यूँ जिंदा है…

“क्यूँ ज़िंदा है ज़िंदगी जब ये सवाल करे,
उत्तर अपने सारे बस बवाल करे,
मीठे बोले लगते हो खारे,
ख्वाब सारे रह जाए अधूरे,
जो आंखों में आंसू भर भर आये —
उफ्फ! अब ना तो जिया जाए,
तब मन की गिरह खोल के सारी,
सिर्फ़ रब को याद करना।”

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खाने की पसंद-नापसंद: स्वाद से ज़्यादा मन का खेल

“मशरूम का स्वाद हो या मटन-फिश का, कई बार भोजन के प्रति हमारी पसंद-नापसंद सिर्फ स्वाद की बात नहीं होती। यह हमारी परवरिश, संस्कृति और बचपन की थाली का असर होता है। जब कभी आपसे कोई आग्रह करे कि ‘बस एक बार टेस्ट कर लो’, तो याद रखिए—हर स्वाद के पीछे एक स्मृति होती है। मशरूम को लेकर मन की दूरी, स्वाद कलिकाओं की नहीं, बल्कि गहरे संस्कारों और भावनाओं की कहानी है। खाने का चुनाव शरीर और आत्मा दोनों की सहमति से होता है।”

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