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सपनों की कोई सरहद नहीं…

बिहार के छोटे से शहर से निकलकर देश-विदेश में अपनी साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों से पहचान बनाने वाली रंजीता सिंह फ़लक आज महिलाओं के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन चुकी हैं। स्वयंसिद्धा संस्था के माध्यम से वह महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य कर रही हैं, वहीं कविकुंभ पत्रिका और अपने चर्चित काव्य संग्रहों के जरिए साहित्य जगत में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर चुकी हैं।

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बंगलौर में मिथिला महोत्सव:

“बंगलौर की धरती पर मिथिला समाज ने पहली बार संगठित होकर अपनी सांस्कृतिक शक्ति का एहसास कराया। पान, माछ, मखान के स्वाद और धरती से जुड़ने की परंपरा ने यह साबित कर दिया कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही पहचान बचती है।”

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महानता और इंसानियत के बीच खड़ी एक चिंतनशील महिला, जो जीवन के संघर्ष और संवेदनशीलता का प्रतीक है।

वह बहक गई थी…

क्या केवल अच्छा इंसान होना ही महानता की पहली शर्त है? यह कविता आधुनिक युग में महानता, संवेदनशीलता, अतिवाद और मानसिक संघर्ष के जटिल संबंधों पर गहन प्रश्न उठाती है।

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शिवालय

परम धाम शिवालय है, ऊर्जा से भरपूर सकारात्मकता का पुंज। शिवलिंग पर गंगाजल अर्पण, पंचोपचार पूजा और ॐ के जाप से होता कल्याण। श्रावण मास में भक्तों का शिवालय में उमड़ता हुजूम, हर हर महादेव के जयकारे गूंजते हैं। महादेव को सिर्फ एक लोटा जल प्रसन्न कर देता है।”

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लव यू….टेक केयर

शायद तुम्हें लगता है… मैं मज़ाक करता हूँ, छेड़ता हूँ… पर सच्चाई ये है… मैं खुद को तुम्हारे शब्दों में सहेज कर रखता हूँ। मैं तुम्हारे दोस्त में माँ की ममता पाता हूँ, बहन की फिक्र पाता हूँ… और दिल के किसी सबसे कोमल कोने में एक ऐसी प्रेमिका का एहसास करता हूँ… जो कभी मिली नहीं, पर हमेशा पास रही।”

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वर्जित इच्छाओं की अपराधिनी…

आज-कललम्बे दिनऔर छोटी रातों मेंकई ख्वाबएक-सी शक्ल लिएआ रहे हैं और दिनबहुत देर सेअलसाई-सी शाम मेंतब्दील हो रहा नहीं-नहींये खूब तेजचुहचुहाती गर्मियों वाले दिन नहीं ये तो बस अभी-अभी आयेवसंत के पीले दिन हैंजो अचानकइस लॉक डाउन मेंप्रौढ़-से हो गए हैं इस बारहोली के सतरंगीदिनों के बादजाने क्यों इतनेबेरंग से हो गए हैंदिन-रात अपने जन्म…

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अगर ईश्वर एक है तो हम क्यों बंटे हैं?”

हे प्रभु , हे मेरे रचयिता आपने हम मानुस जात की खोपड़ी के अंदर जो दिमाग नाम की लुगदी भरी है न ? वही लुगदी हलचल करती रहती है, प्रश्न करती है, उत्तर मांगती है , खुश होती है , नाराज़ होती है … तो आज मैं नाराज़ हूँ … मेरी नाराज़गी आप से ही…

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क्या मर्द कभी रोते हैं?

“नहीं, कभी नहीं।”“कभी नहीं?”“नहीं, कभी नहीं।”“सच में, कभी नहीं?”“हाँ, सच में कभी नहीं रोते।” हाँ, सच में मर्द कभी नहीं रोते… कहते-कहते आँखों से आँसू छलक पड़े, और उन छलकते हुए आँसुओं में रवानी कब आ गई, पता ही नहीं चला… मुझे नहीं पता कि मर्द पहली बार कब रोया!क्या जब खुदा ने आदम को…

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जिंदगी कुछ इस तरह…

एक समय था जब मेरी पसंद की एक शाम हुआ करती थी — चाय की प्याली, साथ में वो दो होंठ, और मेरे दिल के सबसे करीब वो शहर। अब सब कुछ छूट चुका है। मेरी क्यारी का गुलाब, मेरे गाल का गुलाल, मेरी आँखों का काजल, यहाँ तक कि मेरे होठों की तपिश और जिस्म पर चुम्बन की कल्पना तक — कोई और ले गया। दो जिस्म एक धड़कन बनकर जिसे मैं अपना मान बैठा था, वो अब किसी और के दिल में बस गया। मेरे हर अज़ीज़ को रक़ीब अपने नाम कर गया।

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धुंध में धुन

नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”

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