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नारी शक्ति

नारी केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र के निर्माण में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राचीन काल से ही सीता, गार्गी, सावित्री और अपाला जैसी नारियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से समाज को नई दिशा दी। मध्यकाल में रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर और बेगम हजरत महल जैसी वीरांगनाओं ने अपने साहस से यह सिद्ध किया कि नारी किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं।
आधुनिक युग में भी नारी ने हर क्षेत्र—विज्ञान, राजनीति, कला, खेल और व्यापार—में सफलता के झंडे गाड़े हैं। कल्पना चावला, किरण बेदी, सुनीता विलियम्स और मैरी कॉम जैसी प्रेरणादायी महिलाएँ इसका प्रमाण हैं।

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डॉ. सविता सिंह को मिला ‘हिंदी साहित्य सेवी सम्मान’

, हिंदी दिवस के अवसर पर बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना द्वारा आयोजित विशेष समारोह में जमशेदपुर की सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवयित्री डॉ. सविता सिंह ‘मीरा’ को “हिंदी साहित्य सेवी सम्मान” से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उन्हें बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ द्वारा प्रदान किया गया।

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नींद और शांति का राज: लैवेंडर की खुशबू

“सोने से पहले तकिए पर 2–3 बूँदें लैवेंडर तेल डालें। इसकी खुशबू तनाव कम करती है, शरीर को शांत करती है और नींद को गहरा बनाती है। भले ही असर कुछ हद तक विश्वास (प्लेसबो) से हो, फिर भी सोने का माहौल सुखद और आरामदायक बनता है।”

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फूलों की माला, हवा का राग”

“हर्षित धरा, हर्षित अंबर, कोहरे की विदाई, भौंरे और तितलियों की मुस्कान। दहकते पलाश, हरे-हरे परिधान, पीली सरसों की सजती दुकान। गेहूँ और चने की झूमती बाली, कोयल की मतवाली कूक। अमलतास की झूलती डालियाँ, फूलों की माला लिए प्रीत खड़ी है द्वार पर—सारी धरती बसंत से प्यार में डूबी हुई।”

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तुम्हारे बाद भी, तुम्हारी निशानियाँ

तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी हर छोड़ी हुई चीज़—कपड़े, प्याली, तौलिया—मुझे तुम्हारी याद दिलाती है। तुम बिखेरते जाते हो और मैं उन्हें जतन से सहेजती जाती हूँ, क्योंकि इन्हीं में हमारा रिश्ता साँस लेता है।”

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hindi divas

हर स्वाद में मिठास

जैसे हर आम का स्वाद अलग होते हुए भी मीठा होता है, वैसे ही गीता, क़ुरआन और बाइबिल जैसी सभी धर्मग्रंथों में भी अपनी-अपनी मिठास है| बिना दूसरों को चखे हम कैसे कह सकते हैं कि स़िर्फ हम ही सर्वोत्तम हैं. वही बात भाषा को लेकर भी है, हर भाषा की अपनी मिठास है.

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कभी तुम्हारा कभी हमारा

ज़िंदगी कभी हमें सहारा देती है, कभी हम दूसरों के लिए सहारा बन जाते हैं। हालात चाहे जैसे हों, अमीर हो या ग़रीब, सबको तमीज़ से पेश आना होता है। भूख-प्यास, सुख-दुःख, किनारा या तूफ़ान — ये सब कभी तुम्हारे हिस्से आते हैं, कभी हमारे। यही जीवन का सच है कि नज़ारा बदलता रहता है और हर किसी की बारी आती है।”

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हिंदी को ही राष्ट्रभाषा होनी चाहिए

जब 1947 में देश को आज़ादी मिली, तब भाषा की बड़ी चिंता खड़ी हुई। हमारा भारत एक विशाल देश है, जहाँ विविध संस्कृतियाँ हैं, सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं, और हज़ारों बोलियाँ भी हैं। हर राज्य की अनेक मातृभाषाएँ हैं। ऐसे विशाल देश को आज़ादी के बाद निवास करने वाले असंख्य भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक समूहों को एक साथ मिलाने का प्रयास भारत की नवनिर्माण सरकार कर रही थी। जबकि हमारे देश के पास स्वयं की कोई राष्ट्रीय भाषा ही नहीं थी।

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मान वाणी हिंदी

“हिंदी अब केवल देश तक सीमित नहीं रही, विदेशों में भी उसका मान बढ़ा है। लोग हिंदी सुनते, समझते और अभिवादन में भी अपनाते हैं। फिर भी हमारे ही शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों को यह सिखाया जाता है कि विकास अंग्रेज़ी से होगा, जबकि हिंदी बोलने पर मानो कोई अपराध कर दिया गया हो। यही हमारी सबसे बड़ी त्रासदी है।”

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मेरी माँ 

मेरी माँ घर से बाहर तो जाती हैं, लेकिन घर को घर पर छोड़ नहीं पातीं। उनकी गृहस्थी उनकी परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहती है। रसोई उनके लिए वह जगह है, जहाँ बच्चे जैसी मासूमियत और स्नेह बसता है। लोग कह सकते हैं कि वह सिर्फ एक गृहिणी हैं, पर मेरी माँ केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।
उन्होंने मुझे इतिहास, भूगोल और गणित की बारीकियाँ, साहस, सहिष्णुता और समग्र दृष्टि दी। लगभग सभी विषयों का ज्ञान और जागरूकता उन्होंने मुझे प्रदान की। इस पूरी प्रक्रिया में मेरे पिता भी मेरे और माँ के विकास में साथ रहे।

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