चुप्पी में दर्ज एक स्त्री

तभी लिख सकी हूँ यह सब जब…

देखा था उसे कई बार
आँखें नीचे कर, चेहरे को पल्लू से ढके, कई बार…
चेहरे और पीठ के नील निशान सब बयाँ कर देते थे।
कहीं से नहीं लगता था कि वह कपड़े धोते हुए फिसलकर गिरी थी।
गिरने से नील निशान पीठ पर नहीं पड़ते।

खेलते वक्त बचपन में कई बार गिरी हूँ मैं,
चोटिल हुई हूँ,
कभी घुटने टूटे, तो कभी कोहनी पर चोट लगी,
पर पीठ पर नील निशान कभी नहीं पड़े।

“दीदी, अस्पताल से लौटकर काम पर आऊँगी।”
देखा था उसके पीले, ज़र्द चेहरे को,
लड़खड़ाते कदमों को।

आसानी से गर्भपात करवाने के आदेश को सहती…!!
डाँटने पर कहती
“दीदी, यही किस्मत लेकर पैदा हुए।”

देखा था एक दिन सहेली की भाभी को,
जब नौकरी पर जाने से पहले निभा जाती थी कई काम…!!

आँखें सब बयाँ कर देती थीं,
ज़ुबाँ और चेहरा हुनरमंद।
मेकअप की परत “सब ठीक है” का झूठा दावा करती।

कितनी सहजता से छुपा ले जाती हैं संवेदनाओं को,
अवर्जित होती इच्छाओं को।
बड़े सहज भाव से छुपा लेती हैं वे स्त्रियाँ
एक उम्र पार होने पर भी,
नहीं व्यक्त करतीं,
घुटती रहती हैं अंदर ही अंदर
अपनी दबी अभिव्यक्तियों संग
कभी पिता से सहमति में,
तो कभी पति से।

निश्चिन्त नहीं कर सकीं अभी तक अपना ठिकाना।
हाँ, बाँट दी जाती हैं वे
दो घरों की आधी-अधूरी दहलीज़ में।
करती हैं पूरी ईमानदारी से गुज़ारा।

कौमार्य टूटने का दंश झेल लेती हैं
वे आँसुओं के साथ
मुट्ठियों में भींचकर…!

अनवरत एक सृजन तक
सींचती हैं एक पूरी सृष्टि।
लड़खड़ाती हैं न जाने कितनी बार,
फिर भी नियति को अपने
सर-माथे पर
निरंतर जारी रखती हैं
अपने सफ़र का सिलसिला
सिर्फ़ इसी आस पर
कि एक उम्र में शायद
वे कर सकें विरोध…?

तब तक वह खुद ही हो जाती है अपंग,
जब खुद की निर्मित सृष्टि भी
करने लगती है नज़रअंदाज़।
बेबस आँखें लिए
एक बार फिर वह तकती है
ऊपर की ओर…!!
(पहली बार अपनी मर्ज़ी से
जब अवतरित हुई थी)

हर बार जब हारने लगती है,
तो उलझ जाती है
खुद की नींदों से।
सपनों से डरने लगती है,
पलकों को बंद करने से…!!

अभी तक “ना” नहीं कह सकी।
जानती है
जिस दिन “ना” करेगी,
नोच ली जाएँगी वे,
“त्रिया-चरित्र” के नाम पर
अलंकृत की जाएँगी
कई उपमाओं में।

कमज़ोर हो चुकी वह
घुटती रहती है
हर उम्र, हर ओहदे की
साँवली हो या शुभ्रा…
नहीं लाँघ पाती
खुद की ही
अवर्जित अभिव्यंजनाएँ…!!

कभी अहिल्या-सी श्रापित,
तो कभी द्रौपदी-सी नियति लिए।
कभी उर्मिला-सा विरह-वियोग सहती,
तो कभी सीता-सी
अग्नि-परीक्षा देती…!!

आज भी कायम हैं स्थितियाँ।
पता है—
छली हुई स्त्रियाँ
कभी खुले आम शिकायत नहीं करतीं।
तभी पौरुष, दंभ
आज भी निश्छल
कुलाँचे मारता है
और भरता रहता है
अपनी मनमुताबिक उड़ान।

स्त्रियों की ओर
हेय दृष्टि गाड़े
उफ़्फ़…!!

छली जाएँगी स्त्रियाँ
हर रूप में,
सदियों तक…!!

वे एक उम्र की अवधि लेकर
अवतरित होती हैं
और उस उम्र को
समर्पित कर देती हैं
अपनी नियति के संग।

आख़िरी पड़ाव में
जहाँ बिना प्रश्न पूछे
कर दी जाती हैं
अग्नि के हवाले,
कभी सुहागन बन,
तो कभी
सफ़ेद वस्त्रों के संग…
निर्धारित परंपराओं के साथ…!

सुनो…!!
जी जाती हैं वे
अपने को
अपनी अंतिम यात्रा तक—
एक अभेद रहस्य की भाँति…!!

One thought on “चुप्पी में दर्ज एक स्त्री

  1. एक औरत के मन का द्वंद्व जो आप अच्छे से समझती हैं सुरेखा जी नमन है आपकी लेखनी को

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