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क्रान्ति

सुनीता मलिक सोलंकी, मुजफ्फरनगर (उप्र)

वो सब अक्सर ही…
खुश रहने को कहते हैं,
और ये भी कहते हैं कि
दुनिया दो दिन का मेला है।
कोई अपना बिछुड़ता रहेगा,
और पराया मिलता रहेगा।

हमने कहा कि
मगर अपने और मिलने वाले में
अंतर तो होगा?
तो फिर कोई पराया
भला अपना कैसे होगा!?
मानने से पराये अपने नहीं होते,
अपने कौन, समय पर साथ
सभी निकलते, छुड़ा के हाथ।

धैर्य खोए से दिखते हैं सब व्यक्ति,
चीज़ें तत्क्षण मिलने पर दृष्टि।
जान लेना यह है ज़रूरी
कि मूल्यवान चीज़ें समय लेंगी,
आसानी से नहीं मिलेंगी।
कभी-कभी अपना सब खोने पर भी
हाथ मलती रह जाएँगी।

मौसमी फल-फूल नहीं रिश्ते
कि आज बो दिए,
शीघ्र फल-फूल आ जाएंगे।
जान लेना होगा कि उतनी ही
जल्द ये चले भी तो जाएंगे…
लेकिन…

चिनार या आम के दरख़्त
लगाओगे तो समय लगेगा।
धीरे-धीरे, बरसों में पौधा
पेड़ बनेगा, आसमान छूने लगेगा,
चाँद-तारों से बातें करेगा।

इसके पीछे बरसों-बरस साध्य है,
काम नहीं आएगा अधैर्य।
धैर्य और सतत अभ्यास से
क्रांति सा कुछ ज़रूर घटेगा।

कृष्ण को घटी,
क्राइस्ट को घटी,
तुम्हें, हमें, एक को, अनेक को
आख़िर सभी को घट सकती है।
ये क्रांति है, सबमें हो सकती है
विचारों की क्रांति,
नए की क्रांति।

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