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क्रान्ति

ह कविता तात्कालिक सुख और अधैर्य से भरी दुनिया के बीच धैर्य, साधना और विचार की क्रान्ति का घोष है। रिश्तों को मौसमी फल-फूल नहीं, बल्कि चिनार और आम जैसे दीर्घजीवी वृक्ष मानते हुए यह रचना बताती है कि सच्चा परिवर्तन समय, सतत प्रयास और विश्वास से जन्म लेता है और वही विचारों की वास्तविक क्रान्ति है।

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जब चिड़िया चुग गई खेत !

तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में आगे बढ़ते हुए विनोद ने सफलता तो पा ली, लेकिन रिश्तों को समय देना भूल गया। करवाचौथ के दिन एक गजरा उसे एहसास दिला देता है कि प्यार बड़ी चीज़ों में नहीं, बल्कि उन छोटे पलों में छिपा होता है जिन्हें वह हमेशा टालता रहा। जब समझ आया, तब बहुत देर हो चुकी थी।

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