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चुप्पी में दर्ज एक स्त्री

स्त्री के उस अनकहे इतिहास की साक्षी है, जिसे वह नीले निशानों, झुकी आँखों और मौन सहमति के बीच ढोती रहती है। पिता से पति तक, देह से धर्म तक, वह हर भूमिका निभाती हुई अपनी इच्छाओं को अवर्जित कर देती है। अहिल्या, द्रौपदी, उर्मिला और सीता की तरह वह सदियों से अग्नि-परीक्षाओं में झोंकी जाती है फिर भी सृजन करती है, सहती है और अंत तक एक अभेद रहस्य बनी रहती है

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