
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
महिदपुर रोड मेरे लिए स़िर्फ एक जगह नहीं, बल्कि यादों का ऐसा पन्ना है, जिसे पलटते ही इतिहास, बचपन और उत्सव एक साथ जीवित हो उठते हैं. बाद में समझ आया कि जिस धरती पर हम बेफिक्र खेलते-कूदते बड़े हुए, वहाँ कभी 1817 में मराठों और अंग्रेज़ों के बीच निर्णायक युद्ध लड़ा गया था. उसी युद्ध के बाद मंदसौर संधि हुई और मालवा अंग्रेज़ों के अधीन चला गया. तब तो यह सब किताबों की बातें थीं, लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है. इतिहास हमारे पैरों के नीचे ही सांस ले रहा था.
गोगापुर तालाब के पास स्थित गुप्तेश्वर महादेव मंदिर मेरी स्मृतियों का स्थायी ठिकाना है. बचपन में वह मंदिर मुझे रहस्यमय और बहुत पुराना लगता था. बाद में समझ में आया कि यह केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पुरातत्व की अमूल्य धरोहर भी है. पत्थर से बना गर्भगृह, विशाल शिवलिंग और जलाधारी देखकर सहज ही लगता था कि कभी यह मंदिर अत्यंत भव्य रहा होगा. मंदिर का नंदी और उसके क्षतिग्रस्त होने की कहानी भी मैंने बड़ों से सुनी. जब मंदिर को पास ही दूसरे स्थान पर ले जाया गया और नया निर्माण शुरू हुआ, तो भीतर कहीं यह टीस भी रही कि पुरानी चीज़ें कितनी चुपचाप हमारी आँखों से ओझल हो जाती हैं.
लेकिन गुप्तेश्वर महादेव का असली रूप तो मुझे मकर संक्रांति के मेले में दिखाई देता था. वह आठ दिन का मेला हमारे लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता था. मेला देखने जाने की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती. बैलगाड़ियों में बैठकर या पैदल चलते हुए मेला पहुँचना आज सोचूँ तो किसी तीर्थयात्रा जैसा लगता है.
मेले में कदम रखते ही अलग ही दुनिया सामने खुल जाती थी. सजे-धजे बैल, घोड़े, पशुओं की बोली लगती आवाज़ें, दूर-दूर से आए व्यापारी और चारों ओर फैली रौनकसब कुछ मन को बाँध लेता था. बच्चों के लिए झूले और चकरी किसी जादू से कम नहीं होते थे. नाटक मंडलियां और खेल-तमाशे हमें देर तक रोके रखते.
मुझे आज भी याद है, कैसे कस्बे की प्रतिष्ठित दुकानेंबड़ी होटल, शिवनारायणजी पोरवाल की होटल, भंवर उस्ताद, भंवर माली, भेरुलालजी चोरडिया, गणेशलालजी धमोनियाखासतौर पर सजी-धजी दिखाई देती थीं. दाल-बाटी की खुशबू पूरे मेले में फैल जाती थी. दूर-दराज़ से आए पशुपालक और व्यापारी वहीं बैठकर सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन करते थे. वह स्वाद शायद आज के किसी होटल में नहीं मिल सकता. मेरे लिए मेले का सबसे बड़ा आकर्षण टूरिंग टॉकीज़ और फोटो स्टूडियो होते थे. ज़मीन पर बैठकर ़िफल्म देखना आज की पीढ़ी को अजीब लगे, लेकिन तब वही हमारा सिनेमा हॉल था. मेरा गाँव मेरा देश या गोमती के किनारे देखते हुए कोई यह नहीं देखता था कि कौन किस परिवार से है. सब एक साथ कहानी में खो जाते थे.
…और फिर फोटो स्टूडियो स़िर्फ श्वेत-श्याम तस्वीरें, जिन्हें हाथों से रंगकर रंगीन बनाया जाता था. सुवासरा का यादगार स्टूडियो आज भी मेरे ज़ेहन में बसा है. मोटरसाइकिल, घोड़े पर डाकू की वेशभूषा या कार के कट-आउट के साथ परिवार की तस्वीरआज भी कई घरों में उन तस्वीरों में समय ठहरा हुआ दिखता है.मेले के आख़िरी दिनों में चावड़ी कटने का दिन अपने आप में खास होता था. अच्छी नस्ल के पशुओं को इनाम मिलता और उनके मालिकों के चेहरे पर गर्व देखकर लगता था कि यह स़िर्फ पुरस्कार नहीं, मेहनत का सम्मान है.
आज जब गोगापुर का मेला पहले जैसा नहीं रहा, तब महसूस होता है कि हमने स़िर्फ एक मेला नहीं खोया. हमने साथ बैठकर हँसने, देखने और जीने की वह सामूहिक संस्कृति खो दी है. लेकिन मेरे भीतर वह मेला आज भी लगता है. हर मकर संक्रांति पर, हर स्मृति में, हर उस तस्वीर में जो दीवार पर टंगी अब भी मुस्कुरा रही है.
इतिहास हमेशा खुद को दोहराता है।… याद वो है ही नहीं आए जो अकेले में… यादे तो हमको मेले में भी तनहा कर देती हैं । नमन आपकी लेखनी को
आपके लेख पढ़कर ऐसा लगता है कि आप इन सभी लेखों की एक पुस्तक प्रकाशित करवा सकते हैं। यादों की बारात….. सुनहरी यादें, उजली यादें, खट्टी मीठी यादें, ….
आपके सारे लेख -यादों की बारात जैसे लगते हैं, कुछ सुनहरी यादें, कुछ खट्टी यादें, अंधेरे में रोशनी की किरण जैसी यादें, इन सारी यादों को संजोकर एक पुस्तक प्रकाशित करवाई जा सकती है.