रंगों में लोक, शब्दों में जीवन
झारखंड के छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर चित्रकला, साहित्य और लोकसंस्कृति के शोध तक पहुंचा। जानिए लोककला, मंजूषा, जादोपेटिया और लोक जीवन को लेकर एक कलाकार-लेखिका की दृष्टि।

झारखंड के छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर चित्रकला, साहित्य और लोकसंस्कृति के शोध तक पहुंचा। जानिए लोककला, मंजूषा, जादोपेटिया और लोक जीवन को लेकर एक कलाकार-लेखिका की दृष्टि।
महिदपुर रोड के बाजार में दुकानों के बाहर रखी एक साधारण कुर्सी कभी व्यापार की एक अनोखी परंपरा का प्रतीक हुआ करती थी। यह कुर्सी बताती थी कि दुकान की ‘बोनी’ हुई है या नहीं, और इसी के साथ जुड़ी थी आपसी समझ, अपनापन और बाजार की अनकही भाषा। आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन यह कुर्सी अब भी उन सुनहरी यादों को जीवित रखे हुए है।
गोगापुर का मेला मेरे लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बचपन की वह दुनिया है जहाँ उत्साह, जिज्ञासा और अपनापन एक साथ साँस लेते थे। बैलगाड़ी में बैठकर मेले की ओर जाना, दाल-बाटी की खुशबू में भूख से ज़्यादा आनंद महसूस करना और ज़मीन पर बैठकर टूरिंग टॉकीज़ में फ़िल्म देखना ये सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। आज मेला भले ही बदल गया हो, पर मेरे भीतर वह अब भी वैसे ही जीवित है, जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो।