
पूनमसिंह, प्रसिद्ध लेखिका, मेरठ
बहुत फर्क होता है
सब ठीक है होने में,
सब ठीक है कहने में।
हाँ, बहुत फर्क होता है
किसी बात को कहने में,
किसी बात को सहने में।
परन्तु,
शायद बहुत आसान होता है
जब कोई पूछे- कैसे हो?
इस प्रश्न के उत्तर में मौन साधकर,
हाँ में सिर हिलाकर,
मौन स्वीकृति देने में,
खुद को ठीक बताने में,
उस स्थिति को सहने में,
उस स्थिति में रहने में।
हालाँकि,
हाँ कहने वाला और
हाँ सुनने वाला-दोनों जानते हैं
कि कहीं कुछ तो अनकहा है,
बाकी अभी कुछ अनसुना है।
तथापि,
उसके हाल पर छोड़कर
अक्सर चला जाता है
वो सुनने वाला
अपने काम पर…
अपना ध्यान रखना -ये दो लफ्ज़
उसकी झोली में डालकर
बढ़ जाता है आगे,
शायद खुद को महान मानकर।
परन्तु,
क्या यही एक मानव होने की सार्थकता है?
क्या यही कहलाता है मानव होना?
क्या यही है मानव की परिभाषा?
दो शब्द बोलकर आगे बढ़ जाना?
क्या ज़रूरी नहीं है
उस स्थिति में
उस इंसान को दो घड़ी का समय देना?
सहारा देना?
कुछ पल के लिए ही सही,
उसके पास बैठकर
उसके मन के छिपे भावों को
पढ़ने और समझने की कोशिश करना?
क्या यह ज़रूरी नहीं है?
बेशक, आज के इस युग में
सब बहुत व्यस्त हैं
पर क्या किसी ज़रूरतमंद की ज़रूरत
पूरी करने से ज़्यादा कोई काम
ज़रूरी है?
ज़रूरत सिर्फ़ धन से नहीं,
मन से भी पूरी करनी चाहिए
किसी के मौन को समझकर,
उसके अनकहे भावों को पढ़कर,
कभी उसे हृदय से लगाकर।
हाँ, तब… शायद…
बोल पड़े वो खामोश मौन।
बस यूँ ही।
बहुत सुंदर
बहुत ही सुन्दर
बढ़िया
बेहतरीन अभिव्यक्ति 👌👌
बहुत ही सार्थक रचना
बहुत ही सार्थक रचना
मौन को समझ भावों को पढ लिजिए।
बहोत सुंदर 👍