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कुछ अनकही …

सब ठीक है होने और सब ठीक है कहने में बहुत फर्क होता है। अक्सर हम हँसी के पीछे छिपी खामोशी नहीं पढ़ पाते। कोई पूछे“कैसे हो?” और हम सिर हिलाकर हाँ कह दें, तो समझिए, आधी पीड़ा वहीं मौन में कैद रह जाती है।

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