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कुछ अनकही …

सब ठीक है होने और सब ठीक है कहने में बहुत फर्क होता है। अक्सर हम हँसी के पीछे छिपी खामोशी नहीं पढ़ पाते। कोई पूछे“कैसे हो?” और हम सिर हिलाकर हाँ कह दें, तो समझिए, आधी पीड़ा वहीं मौन में कैद रह जाती है।

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दीवार

कहानी एक सफल लेकिन अकेले हो चुके इंसान— रविन्द्र के दर्द को दिखाती है। महंगे बंगले, नाम, शोहरत और पैसा होने के बावजूद वह अंदर से टूट चुका है, क्योंकि उसकी माँ अब नहीं रही। उसने माँ से वादा किया था कि उसे हर सुख देगा, पर उसी “बड़े मकान की दीवारों” ने बेटे और माँ के बीच दूरी बना दी। माँ शायद आख़िरी वक़्त में दर्द में थी, पर रविन्द्र को पता न चला क्योंकि “दीवारों” ने आवाज़ और अहसास रोक लिए।रविन्द्र आज पछता रहा है कि असली घर प्यार और साथ से बनता है, दीवारों से नहीं।यही दर्द और पछतावा पूरी कहानी का मूल है।

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