Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

आख़िर में…

किश्वर अंजुम, भिलाई (छत्तीसगढ़)

“ओह! सब चले गए! शोर ओ गुल थमा ! आह! कितना सुकून है। चलो! अब मैं चैन से सोऊंगी।”

मैंने दिल में कहा और गहरी ख़ामोशी में डूबने लगी।अचानक किसी ने झिंझोड़ कर जगाया।

मैंने घबरा के आँखें खोली।

“भाभी! जल्दी उठिए, सहरी का वक्त हो रहा है! नन्द ने दरवाज़ा खटखटाया। कच्ची नींद से उठाने पर दिल में आई चिड़चिड़ाहट को दबाकर चेहरे पर मुस्कान का मुखौटा सजा कर, मैं किचेन की तरफ़ बढ़ गई। “सुनो! अम्मा की कज़िन के बेटे की शादी है, कल सुबह की ट्रेन है, सुबह जल्दी उठ कर टिफिन बना लेना…” रात के बारह बजे, घर के काम समेट कर जैसे ही सोने आई, शौहर ने हुकुम दिया, चार घंटे की नींद के बाद उठने के नाम से दिल ऐंठ कर रह गया लेकिन ज़ाहिर में मैं वो मुखौटा पहने रही जिस पर टैग चस्पा था, “अच्छी” बीवी का… शौहर ने मेरा चेहरा अपनी तरफ़ कर लिया…

“अस्पताल जाने की ऐसी क्या ज़रूरत बहु? अभी घरेलू इलाज करके देखो, न ठीक हो तो देखते हैं, बुखार में तपते बेटे को काढ़ा पिलाते अपनी सास को देखती रही, चुप रह गई, मुखौटा आज भी नहीं उतर पाया, “बेबस मां” होने का…

रात को बच्चे के रोने पर नींद पूरी नहीं हुई, पर सुबह से घर के सारे काम निपटाने, उठना ही पड़ा, “अच्छी बहु” का मुखौटा लगाकर…दिन पर दिन, ढेरों मुखौटे पहनती-उतारती मैं, नींद को तरसी एक ऐसी औरत जो हर तीसरे घर में पाई जाती होगी।

विदाई के समय मिली नसीहतें, सब्र, खुलुस और एहतेराम की, मैंने मान ली थीं। ज़िंदगी ने कई तरह के रूप धार कर मुझे आज़माया और मैं हर आज़माईश पर खरी उतरती रही, अपने अरमान को अपने दिल में दबा-दबा कर एक खामोश मदफ़न(कब्र )बनाती गई और मेरे अरमान भी क्या थे? एक सुकून की गहरी नींद जिसमें कोई जगाए, ये डर न हो…अपनी ज़ात को मुखौटों के नीचे दबा कर कुचलना सीखती गई और एक अच्छी सलीकेदार बीवी, बहु, मां और सास का तमगा साल दर साल हासिल करती गई। नींद पूरी हो न हो, घर के काम पूरे होते थे।

सुबह के चार बजे से उठकर मुखौटे बदल-बदल कर फ़र्ज़ अदा करते करते, न जाने कब रात हो जाती थी। अधूरी नींद और पूरी ज़िम्मेदारियों के बीच मेरे चेहरे पर एक के बाद एक मुखौटे चढ़ते उतरते रहे। बच्चे कब बड़े हो गए, बालों में चांदियाँ कब उतर आईं, पता ही नहीं चला।
*

झिंझोड़ कर जगाने पर मैंने आँखें खोलीं !

‘मुनकर-नक़ीर’ थे। (ये उन फरिश्तों के नाम हैं जो कब्र में दफनाए जाने के बाद, मृत इंसान से सवाल करने आते हैं, इस्लामिक मान्यता के अनुसार)

इख़तितामी नींद( फाइनल नींद)भी कच्ची ही तोड़ दी गई।

और मुझे याद आया, इनका आना तो तय है।

लेकिन, सवाल-जवाब का ये दौर, मैं, मैं जानती हूं , ये होना था, लेकिन, लेकिन, आँखें नींद से बोझिल हुए जा रही हैं, न उनके सवाल सुन पा रही हूं, न जवाब याद आ रहे हैं।मुझे तो सवालों के जवाब देने हैं, मेरे जवाब के आधार पर मेरी कब्र कुशादा(spacious) होगी या नहीं, ये तय होगा।मैंने कोशिश की कि जवाब दे सकूं लेकिन, लेकिन, हर सवाल के जवाब में मेरे मुंह से बस यही निकल रहा है “नींद”….

“मैं औरत हूं, सारी ज़िंदगी सुकून की नींद के लिए तरसी औरत…मेरी नींद की कब्र को नींव बनाकर मेरे घर वालों ने अपनी ख़्वाहिशात के महल बनाए हैं। मेरे लिए ये सवाल नहीं हैं, जाओ, किसी मर्द को उठा कर उससे सवाल पूछो, मैं औरत हूं, मुझे अब तो चैन की नींद नसीब हुई है, सोने दो!! मुझे अब तो सोने दो…”मैंने आख़िर में सारे मुखौटे उतार दिए, अपने दिल की कर गई। जवाब मालूम हैं मुझे, लेकिन दूंगी नहीं, पहले नींद पूरी करूंगी, जाओ! बाद में आना, अभी मुझे सोने दो….

और मैं सो गई।

4 thoughts on “आख़िर में…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *