आख़िर में…

ज़िंदगी भर मुखौटे पहनती रही. अच्छी बीवी”, “अच्छी बहू”, “बेबस मां” के।
नींद हमेशा अधूरी रही, काम हमेशा पूरे हुए।
जब आख़िरकार सुकून की नींद मिली, तब भी किसी ने झिंझोड़ कर जगा दिया।अब तो मैं बस यही कहना चाहती हूं . “मुझे अब तो सोने दो… अब कोई मुखौटा नहीं, कोई फ़र्ज़ नहीं. बस नींद।”

Read More
hindi divas

हर स्वाद में मिठास

जैसे हर आम का स्वाद अलग होते हुए भी मीठा होता है, वैसे ही गीता, क़ुरआन और बाइबिल जैसी सभी धर्मग्रंथों में भी अपनी-अपनी मिठास है| बिना दूसरों को चखे हम कैसे कह सकते हैं कि स़िर्फ हम ही सर्वोत्तम हैं. वही बात भाषा को लेकर भी है, हर भाषा की अपनी मिठास है.

Read More