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आख़िर में…

ज़िंदगी भर मुखौटे पहनती रही. अच्छी बीवी”, “अच्छी बहू”, “बेबस मां” के।
नींद हमेशा अधूरी रही, काम हमेशा पूरे हुए।
जब आख़िरकार सुकून की नींद मिली, तब भी किसी ने झिंझोड़ कर जगा दिया।अब तो मैं बस यही कहना चाहती हूं . “मुझे अब तो सोने दो… अब कोई मुखौटा नहीं, कोई फ़र्ज़ नहीं. बस नींद।”

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खुद को निहारना भूल गई वो..

कविता महिलाओं के अक्सर अनदेखे संघर्षों को उजागर करती है, जो हर रस्म, हर बंधन और त्यौहार निभाती हैं, फिर भी खुद की खुशियों और अपनी देखभाल के लिए समय नहीं निकाल पातीं। सुबह की भागदौड़, बच्चों को तैयार करना, टिफ़िन बनाना और घर के काम निपटाना—इन सब में वह अक्सर अपने आप को आइने में देखना भूल जाती हैं। पति, सास-ससुर और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते हुए हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान देती हैं, पर अपने लिए समय नहीं निकाल पातीं। बिंदी, पायल, झुमके और पल्लू संवारना—सब पीछे रह जाता है। बीमार होने पर भी उन्हें ताने और कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह कविता महिलाओं की अद्भुत सहनशीलता, उनके कर्तव्यों के प्रति समर्पण और रोज़मर्रा के जीवन में किए जाने वाले भावनात्मक परिश्रम को दर्शाती है, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है।

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पैंतीस-चालीस की स्त्री

“पैंतीस-चालीस की स्त्री—घर की रौनक, रिश्तों की संरक्षक, प्रेम और वात्सल्य की सजीव प्रतिमूर्ति। बिना किसी दवा या शौक के, जीवन में खुशियाँ और आशा फैलाती। सच में, ये स्त्री कितनी खूबसूरत होती है।”

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