बहू नहीं कोई देवी हो

डॉ. उर्मिला सिन्हा, प्रसिद्ध लेखिका, रांची

स्वभाव से निश्छल, मेहनती नीरा ने महसूस किया कि उसके सास-ससुर को घर-परिवार में वह स्थान प्राप्त नहीं है जो बाकी लोगों को है।
विवाह के पश्चात फौजी पति वापस सीमा पर चले गए। वह भी मायके भेज दी गई।

“नीरा ससुराल नहीं जाएगी…?”
“अब दामाद ड्यूटी पर गए हैं, तब ये कहाँ जाएगी?”
“क्यों सास-ससुर नहीं हैं… सुना है इकलौता बेटा है।”

जितनी मुँह उतनी ही बातें। माता-पिता यूं ही बातें बना देते… कोई न कोई बहाना।नीरा ने पति को खत लिखा, “मैं मां-बाबूजी के पास जाना चाहती हूँ… अपने घर।”आश्चर्यचकित पति ने प्रत्युत्तर में लिखा, “मेरा संयुक्त परिवार है… माता-पिता सीधेसादे हैं… तुम्हें दिक्कत होगी… मैं आऊँगा तब तुम्हें ले आऊँगा।”लेकिन स्वभाव से संवेदनशील, परिश्रमी और न्यायप्रिय नीरा आज की नारी थी, मां दुर्गा का प्रतिरूप।नीरा का दिल नहीं माना… वह पति के ड्यूटी पर जाने के बाद अपने सास-ससुर के प्रति अपने कर्तव्य से विमुख कैसे हो सकती थी?
अतः एक दिन अपने छोटे भाई के साथ ससुराल पहुंच गई। हक्के-बक्के सास-ससुर हर्षातिरेक से उछल पड़े।
जहाँ आज की लड़कियाँ ससुराल के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ती हैं… पति को ही अपना समझती हैं, वहाँ उसकी बहू स्वेच्छा से सास-ससुर की सेवा में हाज़िर हो गई। सासु मां ने कुलदेवता का आभार जताया।देशसेवा में समर्पित पति अपनी नवपरिणीता के इस अपनापन से अभिभूत, मां भारती की रक्षा में जी-जान से लग गया।अब असली परीक्षा नीरा की शुरू हुई। घरवालों ने इसे भी किनारे करना चाहा, “जाओ तुम कमरे में… जब जरूरत होगी बुला लेंगे,” चाची सास का कठोर स्वर।
“यहाँ क्यों खड़ी हो, भीतर जाओ,” सबका रुखा व्यवहार उसे सोचने पर मजबूर किया… आखिर बात क्या है?

“मेरे पति की तनख्वाह आती है… सासु मां दिनभर खटती हैं… ससुरजी इस उम्र में भी खेतों पर जाते हैं… छोटा-बड़ा सब उन दोनों पर हुक्म चलाता है… और बदले में बचा-खुचा भोजन, मोटा झोंटा, कपड़ा, तेल-साबुन।
यह नाइंसाफ़ी है!” नीरा का भावुक हृदय दहक उठा।”मां, आप बताते जाइए, मैं कर लूँगी,” खुशी-खुशी वह सास का आधे से अधिक काम कर देती। किसी को बोलने का मौका ही नहीं मिलता।
ससुरजी के घर आने पर अन्य लोगों के समान ही उनका आवभगत करती, भोजन परोसती…
“ये बाद में खा लेंगे।”
“क्यों? मैं सबको खिलाती हूँ!”

दरअसल, नीरा के ससुर कम पढ़े-लिखे सरल इंसान थे। सासु मां भी एक गरीब परिवार की अनाथ बालिका थी। अतः सभी इन्हें हीन समझते थे, सिर्फ काम करवाते थे।उनको उचित सम्मान नहीं देते थे। बेटा होशियार निकला… फौज में चयनित हो गया। लेकिन घरवालों के व्यवहार में फर्क नहीं पड़ा।लेकिन बहू नीरा ने अपने सद्व्यवहार, नेकनीयती और परिश्रम से अपने सास-ससुर को उचित स्थान दिलाकर ही दम लिया। पास-पड़ोस खुलेआम कहने लगे, “यह साधारण लड़की नहीं है—नीरा बहू, बल्कि मां दुर्गा का अवतार प्रतीत होती है, वरना इतनी तत्परता और अपनापन सास-ससुर, ससुराल के लिए कौन करता है?”
घर वाले भी नीरा की सशक्तता, ऊर्जावान व्यक्तित्व के आगे घुटने टेक गए।आज सास-ससुर का तीसवां वैवाहिक वर्षगांठ है… फौजी पति भी आया है। नीरा पति से मिलकर धूमधाम से समारोह मना रही है। इस बदली हुई परिस्थिति में घरवाले भी इस खुशी में शामिल होने में ही भलाई समझ रहे हैं।

सब निपटाकर जब बेटा-बहू माता-पिता के पास पहुंचे… खुशी से सासु मां ने नीरा को गले लगाया। रुद्ध कंठ से बोली,
“तुम मेरी बहू नहीं, कोई देवी हो… अष्टभुजा वाली, मां दुर्गा।”

उधर दुर्गा पूजा पंडाल में शंख-घड़ियाल बजने लगे,
“जय देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो-नमः।”

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