बहू नहीं कोई देवी हो

यह कहानी नारी के कर्तव्य, परिश्रम और ससुराल में सम्मान पाने की प्रेरक कहानी है। नीरा, स्वभाव से मेहनती, संवेदनशील और न्यायप्रिय, अपने सास-ससुर के प्रति समर्पित रहती है। शादी के बाद पति के ड्यूटी पर चले जाने के बावजूद वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होती।

कठोर व्यवहार और अन्याय के बावजूद नीरा अपने नेकनीयती और परिश्रम से अपने सास-ससुर को उचित सम्मान दिलाती है। उसके इस समर्पण और अपनापन को देखकर परिवार और समाज भी उसे आदर और सम्मान देने लगते हैं। कहानी में नारी शक्ति, सशक्तता और पारिवारिक प्रेम का संदेश प्रमुख रूप से उजागर है।

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रंगोली

दिवाली नज़दीक थी, और हर साल की तरह श्रद्धा को ससुराल में ही त्योहार मनाना था, जबकि उसका मायका दो गली छोड़कर ही था। शादी के बाद से उसने कभी भी दिवाली के दिनों में माँ के आँगन में रंगोली नहीं बनाई, क्योंकि सास को उसका मायके जाना पसंद नहीं था। हर दिन वह ससुराल के आँगन में रंगोली बनाती, पर मन माँ के खाली आँगन में बसता, जहाँ अब रौनक खत्म हो चुकी थी। एक-दो बार मायके जाकर उसने देखा कि माँ आसपास के बच्चों से छोटी-सी रंगोली बनवाती हैं, पर न माँ ने उससे आने को कहा, न वह कह पाई। बात छोटी थी, पर कहने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाई। उसे हमेशा यह दर्द रहा कि वह बेटी होकर भी अपने घर जाने के लिए ससुरालवालों की अनुमति पर निर्भर है—शायद इसी वजह से लोग बेटा मांगते हैं, क्योंकि बेटियाँ शादी के बाद अपने ही घर के लिए पराई हो जाती हैं।

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