दुर्गा.. 

रीता मिश्रा-तिवारी,प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर

दया और माया दो बहनें थीं। माया खूबसूरत थी और दया सांवली, साधारण नयन-नक्श की, सुशील, सबकी मदद करने वाली थी। देवी दुर्गा पर आस्था उसे बचपन से ही थी। पूजा-अर्चना बड़े मनोयोग से श्रद्धापूर्वक करती थी।
वहीं माया को साज-श्रृंगार, घूमना-फिरना, नाच-गाना बहुत पसंद था। देवी-देवताओं पर उसे कोई आस्था नहीं थी।
बहरोमपुर के सेठ श्री निवास जी के दो जुड़वां बेटे थे — उधो और माधो; दोनों की प्रवृत्ति अपने नाम के अनुसार ही थी। उधो कम पढ़ा-लिखा, सीधा-सादा और कर्मशील था; माधो चालाक और आरामतलब था।
बंशीलाल अपनी बेटी दया की शादी का प्रस्ताव लेकर सेठजी के पास गए। सेठजी बंशीलाल की दोनों बेटियों का विवाह अपने दोनों बेटों उधो और माधो से करने को राजी हो गए।

धूमधाम से दोनों बहनों की शादी सेठजी के दोनों बेटों से हो गई।

दया घर का और उधो बाहर के काम—खेत से लेकर दुकान तक—सब संभालता था। माधो और माया रोज कोई न कोई बहाना बनाकर आराम करते या कहीं घूमने निकल जाते।
इसी तरह समय बीतने लगा। माधो और माया ईश्वर से प्रार्थना करते कि लड़की पैदा न हो और अगर होती है तो गर्भपात करा देते थे। किसी तरह उनका एक लड़का हुआ।दूसरी ओर दया और उधो के आँगन में छः बेटियाँ थीं।सेठजी बूढ़ी हड्डियों की तकलीफ ज्यादा दिनों तक सह नहीं पाए और एक रात उन्होंने ईश्वर का स्वरूप धारण कर लिया (स्वर्गवासी हो गए)।
दया माँ दुर्गा की परमभक्त थी। सुबह-सवेरे उठकर माँ का पूजन-अर्चना करने के बाद ही घर का सारा काम निपटाती।
एक दिन माया ने माधो से कहा, “देखो जी…! उधो को अब हम साथ में नहीं रखेंगे। अलग कर दो उसे। मैंने तो होशियारी की—बेटी को गर्भ में ही खत्म करवा दिया। हमारा एक बेटा है — सुख-समृद्धि, शांति है। वो बेवकूफ दया… कितना समझाया था उसे पर नहीं मानी; कहीं बेटियाँ देवी का वरदान हैं। अरे छः बेटियाँ! समझ रहे हो? अगर साथ रहे तो सारा धन कन्याभोज और उनकी बेटियों की शादी में लूट जाएगा — मेरी मानो, उन्हें अलग कर दो।”

माधो ने उधो को समझा-बुझा कर—कम-ज़्यादा करके—बटवारा किया और वे अलग हो गए। उधो कम पढ़ा-लिखा और सीधा होने की वजह से जो मिला, देवी की इच्छा समझकर स्वीकार कर लिया।समय के साथ बेटियों की उम्र बढ़ती गई और खर्च भी बढ़ा। धन की कमी हो गई। दया दूसरे के घर में चौका-बर्तन, झाड़ू-पोछा का काम करती और उधो मजदूरी करता था।
दया और उधो प्रत्येक वर्ष पूरे नियमपूर्वक माँ दुर्गा की पूजा और नवरात्र व्रत करते थे। उस वर्ष उनकी स्थिति चिंताजनक थी। बहुत सोच-समझकर दया ने उधो से कहा, “अजी! कल से नवरात्र शुरू हो रहा है और घर में कुछ नहीं है। पूजन सामग्री भी खत्म हो गई है। पैसे भी नहीं हैं कि धूप-दीप जलाकर पूजा शुरू करें। आप जाकर भैया से बोलकर कुछ पैसा मांग लीजिए। हम दीदी से कहेंगे तो झिरक कर भगा देंगी।”
“ठीक है, जाते हैं देखते हैं बोलकर, मगर उम्मीद न पालो…” कहकर उधो घर से निकल गया।
इधर माधो बैठकी में आराम फरमा रहा था। तभी माया हँसती हुई आई और बोली, “सुनो जी…अब मज़ा आएगा। देखते हैं नवरात्र पूजा, हवन, कन्याभोज कैसे करता है। भोरे-भोरे दया आई थी पैसा मांगने पर हम भगा दिए उसे। कितना समझाया था कि बेटी न जनो पर नहीं मानी… कहीं बेटी तो देवी का रूप है। आज देखो…कहाँ गया देवी का वरदान… कंगाल बना दिया देवी रूप बेटियों ने… पैसों के लिए मारे मारे फिर रहे हैं। आज उन्हीं देवी पूजन के लिए पैसा नहीं है। हमें देखो — एक बेटा; वो भी बड़ा होकर लाखों कमाएगा। हा हा हा…”

तभी माधो का बेटा आकर कहता है, “बाबा! चच्चा आए हैं।”

माधो बाहर आकर उधो से पूछता है, “क्या है? क्यों आए हो? बोल न, कोई बात है?”
उधो ने अपनी व्यथा सुनाई तो माधो ने उससे कहा, “पहले मेरा एक काम कर दे, उसके बाद पैसे मिल जाएंगे… चल मेरे साथ।”
रास्ते में बच्चे की रोने की आवाज़ सुनकर उधो रुक गया और बोला, “भैया! बच्चे की रोने की आवाज़ आ रही है, चलो देखते हैं।”
माधो के बहुत मना करने पर भी उसने देखना न छोड़ा और पाया कि कच्ची सड़क के किनारे झाड़ियों में एक नवजात बच्ची टोकरी में पड़ी रो रही थी। दया का दिल पिघल गया और उसने बच्ची को गोद में उठा लिया।
“देखो उधो! तुम्हें तो पहले से ही छः बेटियाँ हैं, मेरी मानो इसे यहीं रहने दे दो।”
उधो ने उसकी एक न सुनी और बच्ची को लेकर घर आ गया।
दया, जो माँ दुर्गा की मूर्ति के पास बैठी पूजन सामग्री का इंतज़ार कर रही थी, उधो के गोद से बच्ची को देखकर बोली, “कोई बात नहीं जी — जहाँ छः बेटियाँ हैं वहाँ एक और भी सही। आज प्रथम पूजा के दिन कन्या साक्षात देवी रूप में हमारे घर आई है। हम इसका नाम दुर्गा रख देते हैं?”

“हाँ-हाँ, यह नाम सही है — ‘दुर्गा’। जय माता दी।”
सामग्री बिना ही नवरात्र व्रत का संकल्प लेकर दया ने दुर्गा पूजा कर ली। अब खाने को कुछ भी नहीं था, तो सब भूखे ही सो गए।
दो-तीन दिन में ही हालात थोड़ी सुधरे। इस तरह पांच दिन बीत गए।
एक दिन माधो के घर में अचानक आग लग गई और सब कुछ जलकर स्वाहा हो गया।
अब क्या होगा, इतनी रात को कहाँ जाएँ? माधो ने चिंता व्यक्त की। माया बोली, “उधो के यहाँ चलते हैं; वह ज़रूर हमें शरण दे देगा।”
उधो को सुखी-संपन्न और खुश देखकर दोनों सोच में पड़ गए कि ऐसा कैसे संभव है। पता लगाने के लिए माया रात को सोने का नाटक करके उधो के कमरे में गई और देखा कि वह नन्हीं बच्ची, जो दया के बगल में सोई थी, उठकर धीरे-धीरे बड़ी हो गई और रसोई में जाकर अपना दाहिना हाथ आशीर्वाद के लिए उठा कर खाने-पीने की सामग्री ला रही थी; दूसरे हाथ से पूजा की सामग्री, कपड़े और अन्य जरूरत का सामान भर रही थी, फिर फिर से बच्ची बनकर सो जाती थी।
दो दिन से माधो यही देखकर आश्चर्यचकित था। मन ही मन उसने सोचा—चाहे कुछ भी हो—आज रात तो पकड़ ही लूँगा।
आज महानवमी थी। रात को जब बच्ची अपने वास्तविक रूप में आई और पूरा घर खाद्य-पदार्थ, आभूषण और कपड़ों से भर दिया, तभी माधो सामने आ गया। “हे देवी! माँ, मैं आपको पहचान गया हूँ। मुझे भी थोड़ा आशीर्वाद दे दीजिए, मैया।”
देवी माँ बोलीं, “तुम्हारे अंदर इंसानियत नहीं है; इंसान कहलाने लायक नहीं हो। तुम कन्या भ्रूण का संहार करते हो। नवरात्र पूजा को ढोंग और आडंबर कहते हो; कन्याभोज को नाटक समझते हो। दया और उधो ऐसे नहीं हैं। नाम के अनुरूप वह ममता और मानवता से भरी हुई है। छः कन्याएँ होने के बावजूद भी इसने नवरात्र के दिन अपने पति द्वारा लाए गए एक अनजान कन्या को साहसपूर्वक स्वीकार कर उसका भरण-पोषण किया; निर्धन होते हुए भी विधिवत व्रत पूर्ण किया। उसे उसी का फल मिल रहा है।
जाओ. अपने जले हुए घर में वापस जाओ। तुम्हारा घर कुछ हद तक ठीक हो गया है। इसके अलावा तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। पहले अपने मन को पवित्र करो, अंदर दया भाव उत्पन्न करो और चारों ओर यह संदेश दो कि कन्या भ्रूणों का वध न करें। नवरात्र में यही तुम्हारी सच्ची भक्ति होगी, तभी तुम्हारा पाप मिटेगा।”
“जी माँ… मैं यह संदेश अवश्य चारों तरफ़ दूँगा।”
माँ दुर्गा ने दया के घर को धन-धान्य से भरकर उन्हें आशीर्वाद दिया और फिर अपने स्थान पर चली गईं।

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