रावण दहन

यह लेख रावण दहन की पौराणिक कथा को जीवंत और संवादात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि रावण केवल एक राक्षस नहीं बल्कि विद्वान और शिवभक्त था, पर अहंकार और लालच के कारण उसका संहार निश्चित था। लंका युद्ध के समय देवी दुर्गा की पूजा और हनुमानजी की चतुरता से रावण का यज्ञ विफल हुआ और उसका संहार सुनिश्चित हुआ। इस कथा के माध्यम से विजया दशमी केवल पुतला जलाने का उत्सव नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बन जाती है।

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दुर्गा.. 

दया और माया दो बहनें थीं। दया माँ दुर्गा की परमभक्त थी और अपने घर का पूरा काम संभालती थी, जबकि माया और उसका पति माधो आरामतलब और चालाक थे। दया और उधो की शादी हुई और उनके घर में छः बेटियाँ थीं।
नवरात्र के दिन, दया और उधो की साधारण साधना और भक्ति के बीच, उधो ने रास्ते में एक नवजात बच्ची को पाया, जिसे दया ने अपने घर ले जाकर गोद में लिया। दया ने उसे ‘दुर्गा’ नाम दिया और बिना सामग्री के ही पूजा-अर्चना की।
कुछ दिनों में घर की हालत सुधर गई और महानवमी की रात, बच्ची अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुई। देवी दुर्गा ने माधो को उसकी क्रूरता का पाठ पढ़ाया और दया के घर को आशीर्वाद देकर पुनः खुशहाली दी।कहानी यह संदेश देती है कि **सच्ची भक्ति, मानवता और दया ही परम बल हैं**, और कन्याओं का सम्मान करना जरूरी है।

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