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नारी द्वारा नारीत्व का परित्याग

पूनम शर्मा स्नेहिल, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

क्या वास्तव में नारी की छवि का स्वरूप बिना किसी कारणवश परिवर्तित हो रहा है?
क्या वास्तव में नारी के अंदर नारीत्व समाप्त हो चुका है?
क्या वास्तव में नारी के भीतर की ममता मर चुकी है?

अगर समाज में हो रही गतिविधियों पर नजर डाली जाए तो इस प्रकार के कई मामले उभरकर आंखों के सामने आते हैं, जहाँ नारी से जिस बात की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं है, वह सब कुछ कर गुजर रही है।

सदियों से नारी को ममता का स्वरूप माना गया है। नारी जो खुद को मौत के मुंह में ले जाकर एक नए जीवन को जन्म देती है। पर क्या वास्तव में नारी की गरिमा का मान रखा जाता है, या नारी के साथ सदियों से चले आ रहे शोषण का प्रतिरोध स्वरूप दिखाई देता है।

आज का युग कहता है कि किसी भी पात्र की जितनी क्षमता होती है, उससे ज्यादा उसमें कुछ भी नहीं रखा जा सकता। क्या वास्तव में नारी की सहनशक्ति का पात्र भर चुका है?

जो कल तक ममता का स्वरूप, कोमल और कमजोर मानी जाती थी, आज वही नारी प्रचंड रूप में आ चुकी है।

कई केसों को देखने के बाद एक बात समझ में आती है कि यदि नारी किसी बच्चे को मारती है या उसका परित्याग करती है, तो उसके पीछे छिपी हुई वजह सीधे यह दर्शाती है कि वह अपने बंधन और विषाक्त जीवन की जड़ों को समाप्त करने का प्रयास कर रही है। वह विषाक्त जीवन जो उसे हर दिन सौ बार मारता है।

अक्सर पुरुष किसी भी स्त्री के साथ दुष्कर्म करके अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, परंतु स्त्री ममता के वश में आकर बच्चों को जन्म तो दे देती है, लेकिन 9 महीने की इस सामाजिक प्रक्रिया के दौरान वह बहुत चोटिल होती है। हर नारी पहले यही प्रयास करती होगी कि सामने वाला अपने अंश को अपनाए, पर यह पुरुष प्रधान समाज दुष्कर्म करके पल्ला झाड़ने में सदियों से माहिर रहा है।

जिस प्रकार सारी स्त्रियाँ सही नहीं हैं, ठीक उसी प्रकार सारे पुरुष भी समाज में सही नहीं हैं। मापदंड की कसौटी पर जब भी कहीं किसी शिशु को फेंका हुआ पाया जाता है, तो सीधे नारी के नारीत्व का बखान होना प्रारंभ हो जाता है। कभी कोई उस पुरुष पर उंगली नहीं उठाता, जिसकी वजह से नारी को यह कदम उठाना पड़ा।

कभी कपड़ों की दुहाई, तो कभी देर रात बाहर रहने की, हर तरीके से अगर उंगली उठती है तो सिर्फ एक लड़की के ऊपर। चलो एक बार मान भी लें कि यह सब वजह होती होगी, परंतु फिर एक प्रश्न मन में उठता है।

पुराने लोगों की कही हुई बात याद आती है—“कुत्तों के सामने बोटी डाल दो तो वह उसे नोच कर खा जाते हैं।” तो क्या पुरुष वर्ग…?
अगर ऐसा होता तो 3 साल और 4 साल की बच्चियों के साथ दुष्कर्म नहीं हो रहे होते। इसे तो छोड़ दें, यहां तो 60–65 साल की महिला के साथ भी ऐसी घटनाएँ घटित होती रहती हैं।

चुनिंदा घटनाएं हमारी नजरों के सामने आती हैं, जबकि 90% घटनाएँ सामाजिक दायरे और लोकलाज के डर से ढक दी जाती हैं। पर कभी सोचा है उस स्त्री के मन पर, जो चोटिल होती है? क्या उसका दर्द सिर्फ ढक देने भर से समाप्त हो जाता है?

आज महाकाल रात्रि का स्वरूप देखकर मन में यह विचार आया कि शायद सौम्यता का स्वरूप छोड़कर माँ भी अत्याचार के खिलाफ खड़ी हुई थी, और तभी उन्होंने कालरात्रि का रूप धारण किया था, जिससे वह दुष्टों का संहार कर सकें।

कोई भी घटना हो जाने पर कैंडल मार्च निकालना और काना-फूसी करके दो-चार दिन चर्चा कर लेने से शायद इस समस्या का समाधान कभी नहीं निकलेगा।
आवाज उठाना जरूरी है; विपत्ति कभी किसी के घर आंगन में जाकर नहीं आती।
रौंदे-कुचले जाने से तो बेहतर है, नारी को समाज में सशक्त बनाना।

यह सब बातें सिर्फ विशेष वर्ग की मानसिकता वालों के लिए लिखी गई हैं। समाज में आज भी अच्छे पुरुषों की गिनती कम नहीं है। पर वह कहावत हर जगह सार्थक हो जाती है—एक गंदी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है।

2 thoughts on “नारी द्वारा नारीत्व का परित्याग

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