
कल्पना मनोरमा, प्रसिद्ध साहित्यकार, नई दिल्ली
सूरज अभी डूबा नहीं था,
अँधेरा उतरा नहीं था,
जिद्दी बच्चे लौटे नहीं थे खेलकर घरों में
फिर किसने पुकारा
दुन्नो को…
अनपहचानी कोमलता का नमक
झरता चला गया उसके भीतर तक
कान के पीछे नरम सिहरन जगी
साँझ के चूल्हे पर उबल रही थी दाल,
लकड़ियाँ जलानी थीं दुन्नो को,
पकानी थी दाल
अब तक उसके विचारों में
सिर्फ़ रोटियाँ ही थीं—
जिन्हें पाथना था उसे
जीवन के अंतिम छोर तक
दुन्नो ने किया अभिनय न सुनने का
यही तो सिखाया गया था—
अच्छी लड़कियाँ
नहीं देखतीं आवाज़ की दिशा में
कुँवारी लड़कियाँ बनी होती हैं मोम की,
आँच से बचाकर रखना ही
उनका परम कर्तव्य है
मरीचिकाओं ने
यदि घेर लिया उनका मन,
तो ग़जब हो जाएगा
दुन्नो देर तक सोचती रही
धुएँ के छल्लों में
बालों के ब्याहे गुच्छे खोलना
वह मानती थी गुनाह
उसने सिर झुका लिया चूल्हे पर,
आँच आँखों से खाने लगी
किसी ने फिर पुकारा—
इस बार स्वर में मिठास थी
उसके हाथ में लोई थी,
उसने पूछ लिया आवाज़ की दिशा में—
“कौन हो तुम?
जो पुकारता है मुझे,
पर दिखता नहीं
किसने समझा है मुझे जीवित
और पुकारा है मेरे नाम से,
जबकि मैं भूल चुकी थी अपना नाम
हाँ, सच में मैं ज़िंदा हूँ—
मैं दुन्नो ही हूँ!
बोलो, तुम कौन हो, मुर्शिद?
आवाज़ देकर छिपना अच्छा नहीं
आओ, सामने आओ
देखो मुझे, मैं ज़िंदा हूँ!”
दुन्नो नाच उठी पागलों की तरह
माथे से सरक गई ओढ़नी
उसे पता भी न चला
कि उसने दुहराया अपना ही नाम—
“दुन्नो… पहली बार।”
किन्तु फिर कोई न बोला
वह चौके से निकली
तो देखा आँगन की मुंडेर पर
बैठी थी आस की अंतिम चिड़िया
दुन्नो ने बढ़ाया हाथ,
पर वह भी उड़ गई बिना बोले
दुन्नो लौट गई रसोई में—
जहाँ जल रही थीं लकड़ियाँ या रोटियाँ
जो भी खाएगा,
नहीं बता पाएगा
दर्द दुन्नो का
उस दिन रचने लगी थीं धड़कनें
कुछ अनचाहा
चूल्हे की लपटें
लगने लगीं ठंडी रेत सी
देखते ही देखते
उभरने लगीं अनदेखी अल्पनाएँ
मन के कैनवास पर
दुन्नो भरने लगी रंग अपने मन का
उस दिन खाने में
स्वाद किसी को न आया,
फिर भी दुन्नो ने
किसी के आगे झुककर
नहीं माँगी माफ़ी
पहली बार मिली दुन्नों खुद से जीभर।

बहुत सुंदर रचना