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पहली बार

सूरज ढलने ही वाला था, अँधेरा पूरी तरह उतरा नहीं था और बच्चे अभी खेलकर घर नहीं लौटे थे। तभी किसी ने धीरे से पुकारा — “दुन्नो।” इस पुकार ने उसके भीतर कुछ कोमल और अनजाना जगाया। कान के पीछे हल्की सिहरन दौड़ गई। चूल्हे पर दाल उबल रही थी, लकड़ियाँ सुलगानी थीं और रोटियाँ बनानी थीं। उसके विचारों की दुनिया अब तक रोटियों तक सीमित थी, जिन्हें उसे जीवन भर बेलना था।

दुन्नो ने अभिनय किया जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। यही उसे सिखाया गया था — अच्छी लड़कियाँ आवाज़ की दिशा में नहीं देखतीं, कुँवारी लड़कियाँ मोम की बनी होती हैं, जिन्हें आँच से बचाकर रखना ही उनका कर्तव्य है। लेकिन वह पुकार फिर आई, इस बार स्वर में मिठास थी। हाथ में लोई थामे उसने पूछ लिया — “कौन हो तुम? जो पुकारता है मुझे, जबकि मैं खुद अपना नाम भूल चुकी हूँ। तुमने मुझे जीवित पुकारा, तो क्या मैं सच में ज़िंदा हूँ?”

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