वो ही माँ बनाने को मन करता है

एक नंगी ईंट की दीवार और उसके पास चूल्हा, जिस पर उपले की आँच में रोटियाँ सिकती हैं। माँ के पास चिमटा तो है, फिर भी कभी-कभी ऐसा लगता है कि उसके जीवन से कुछ पल चुराए जाएँ। उसकी तपती ज़िंदगी, खुरदरी हथेलियाँ और जीवन की सारी सिलवटें यह सब गहरी कहानियाँ बयां करती हैं। समय तो गुजर चुका है, लेकिन जो आँसू उसने छुपाए थे, उन्हें समझने और पोछने की इच्छा रहती है। यह एक नज़दीकी और भावनात्मक दृष्टिकोण है, जिसमें माँ के संघर्ष और उसके भीतर छुपी कोमलता दोनों ही सामने आती हैं।

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पहली बार

सूरज ढलने ही वाला था, अँधेरा पूरी तरह उतरा नहीं था और बच्चे अभी खेलकर घर नहीं लौटे थे। तभी किसी ने धीरे से पुकारा — “दुन्नो।” इस पुकार ने उसके भीतर कुछ कोमल और अनजाना जगाया। कान के पीछे हल्की सिहरन दौड़ गई। चूल्हे पर दाल उबल रही थी, लकड़ियाँ सुलगानी थीं और रोटियाँ बनानी थीं। उसके विचारों की दुनिया अब तक रोटियों तक सीमित थी, जिन्हें उसे जीवन भर बेलना था।

दुन्नो ने अभिनय किया जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। यही उसे सिखाया गया था — अच्छी लड़कियाँ आवाज़ की दिशा में नहीं देखतीं, कुँवारी लड़कियाँ मोम की बनी होती हैं, जिन्हें आँच से बचाकर रखना ही उनका कर्तव्य है। लेकिन वह पुकार फिर आई, इस बार स्वर में मिठास थी। हाथ में लोई थामे उसने पूछ लिया — “कौन हो तुम? जो पुकारता है मुझे, जबकि मैं खुद अपना नाम भूल चुकी हूँ। तुमने मुझे जीवित पुकारा, तो क्या मैं सच में ज़िंदा हूँ?”

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माँ का रसोईघर

माँ चूल्हे की आँच में तपकर जीवन को महकाती है। आटे की लोई में वह अपने सपनों को गूँथती और बेलती है। दिनभर की थकान उसके चेहरे से तब गायब हो जाती है जब थाली में पकवानों की खुशबू फैलती है और परिवार का हर सदस्य संतोष से भोजन करता है। बच्चों की चमकती आँखों में उसे अपनी सबसे बड़ी तृप्ति मिलती है।

उसके लिए खाना सिर्फ शरीर का ईंधन नहीं है, बल्कि घर का प्रेम है, जिससे परिवार जीवित और आनंदित रहता है। उसकी रसोई एक तपोवन है, जहाँ वह हर दिन निस्वार्थ भाव से यज्ञ करती है

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