साहित्य, समाज और संघर्ष की मिसाल बनीं रंजीता सिंह
कौन कहता है कि आसमां में सुराख हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों….
इस मशहूर पंक्ति को अपनी ज़िंदगी में सच साबित करने वाली शख्सियत का नाम है रंजीता सिंह ़फलक बिहार के छोटे से शहर से निकलकर देश की राजधानी दिल्ली और देहरादून में अपने दम पर साहित्य, समाज सेवा और सांस्कृतिक जगत में बड़ा मुकाम हासिल करने वाली प्रेरणादायक महिला. वे आज देश-विदेश में एक आइकॉन के तौर पर जानी जाती हैं, खासतौर पर उन महिलाओं के लिए जो सीमित संसाधनों के बावजूद सपनों को उड़ान देना चाहती हैं.
एक समृद्ध पारिवारिक विरासत
रंजीता सिंह का जन्म एक विद्वान परिवार में हुआ. उनके पिता बिहार विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर होने के साथ-साथ वरिष्ठ पत्रकार, समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक भी थे. उनकी माता एक आदर्श गृहिणी रहीं. रंजीता का बचपन बिहार और उत्तर प्रदेश के शहरों में बीता. पढ़ाई में वे हमेशा अव्वल रहीं और रसायनशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की.
विज्ञान की छात्रा से साहित्य की साधिका तक
हालांकि शैक्षणिक पृष्ठभूमि विज्ञान की थी, लेकिन साहित्य उनकी आत्मा में बसता था. बचपन से ही वे लेखन में रुचि रखती थीं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख, कविताएं प्रकाशित होते रहे. पढ़ाई के बाद उन्होंने कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम किया, लेकिन नौकरी के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति और समाज सेवा में निरंतर सक्रिय रहीं.
बीइंग वुमन स्वयंसिद्धा ः एक बदलाव की शुरुआत
युवावस्था में रंजीता सिंह ने महिलाओं की मदद के लिए बीइंग वुमन स्वयंसिद्धा नामक संस्था की नींव रखी. यह संस्था आज देश-विदेश की हजारों एकल, आर्थिक रूप से कमजोर और प्रताड़ित महिलाओं के लिए एक आशा की किरण बन चुकी है. घरेलू हिंसा, उत्पीड़न और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रही महिलाएं इस मंच से सहायता पाती हैं. संस्था द्वारा प्रत्येक वर्ष स्वयंसिद्धा सम्मान का आयोजन होता है जिसमें भारत के हर कोने से आत्मनिर्भर महिलाएं सम्मानित होती हैं. साथ ही, संस्था ग्रामीण कारीगरों, बुनकरों और महिला उद्यमियों को राष्ट्रीय मंच देती है, जिससे उन्हें पहचान और रोजगार दोनों मिलते हैं.
साहित्यिक सफरः कवि से संपादक तक
वर्ष 2016 में रंजीता ने कविकुंभ नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका की शुरुआत की, जिसमें वे संपादक और प्रकाशक दोनों हैं. यह पत्रिका आज साहित्य प्रेमियों के बीच एक लोकप्रिय मंच बन चुकी है. उनके दो काव्य संग्रह प्रेम में पड़े रहना और चुप्पी प्रेम की भाषा है. पाठकों और समीक्षकों द्वारा खूब सराहे गए हैं. खासतौर पर उनकी कविता बिसराई गई बहनें और भुलाई गई बेटियां इतनी चर्चित हुई कि उसे मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया.
बहुआयामी व्यक्तित्व
रंजीता सिंह ़फलक महज साहित्यकार ही नहीं, बल्कि कवि, शायरा, संपादक, समाजसेवी, उद्यमी, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और फैशन डिजाइनर के रूप में भी सक्रिय हैं. वे शास्त्रीय नृत्य, संगीत और रंगमंच में भी गहरी रुचि रखती हैं. दिल्ली और देहरादून में रहते हुए वे बिहार की मिट्टी से जुड़ी रहती हैं और गर्व से कहती हैं. मैं बिहार की बेटी हूं और इस पर मुझे गर्व है.
सफलता का सफर …संघर्ष से सम्मान तक
रंजीता को अनामिका साहित्य सम्मान, बिहार राजभाषा पांडुलिपि अनुदान सहित देश के कई प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं. कम उम्र में ही उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है, वह हर छोटे शहर की लड़की के लिए प्रेरणा का स्रोत है.आज वे हर उस स्त्री की आवाज़ हैं जो खुद को कमजोर समझती है. उनका जीवन हमें सिखाता है कि अगर जिद हो कुछ कर दिखाने की, तो छोटी जगहों से भी बड़ी उड़ान भरी जा सकती है.
रंजीता का कहना है
हर लड़की को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का पूरा हक है. हालात चाहे जैसे भी हों, हौसला न छोड़ें, रास्ते अपने आप बनते हैं.

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज, पुणे