मानवता की मिसाल: नीमच में बच्चों को बचाते हुए महिला ने दी जान

नीमच में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कंचन बाई मेघवाल ने मधुमक्खियों के हमले से बच्चों को बचाते हुए बलिदान दिया नीमच में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कंचन बाई मेघवाल ने मधुमक्खियों के हमले से बच्चों को बचाते हुए बलिदान दिया

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

नीमच (मध्यप्रदेश)-मध्यप्रदेश के नीमच जिले से मानवता और साहस को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। आंगनवाड़ी केंद्र में कार्यरत रसोइया कंचन बाई मेघवाल ने मधुमक्खियों के भीषण हमले के दौरान करीब 20 बच्चों की जान बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।

घटना उस समय हुई जब आंगनवाड़ी परिसर में बच्चे खेल रहे थे। तभी अचानक मधुमक्खियों का एक बड़ा झुंड बच्चों पर टूट पड़ा। बच्चों की चीख-पुकार सुनते ही कंचन बाई बिना एक पल गंवाए उनकी ओर दौड़ीं।

मां बनकर ढाल बनी आंगनवाड़ी रसोइया, मधुमक्खी हमले में बचाए 20 बच्चे

तिरपाल और चटाइयों से बच्चों को ढककर सुरक्षित किया

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कंचन बाई ने मौके पर मौजूद तिरपाल और चटाइयों से बच्चों को ढक दिया और उन्हें सुरक्षित स्थान की ओर धकेल दिया। इसके बाद उन्होंने बच्चों को एक कमरे में पहुंचाया और खुद खुले में खड़ी होकर मधुमक्खियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया, ताकि बच्चों को कोई नुकसान न पहुंचे। इस दौरान कंचन बाई पर मधुमक्खियों ने सैकड़ों डंक मारे। गंभीर हालत में वह वहीं गिर पड़ीं।

अस्पताल में डॉक्टरों ने किया मृत घोषित

ग्रामीणों ने मौके पर पहुंचकर उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मंगलवार को पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया।

पति लकवाग्रस्त, परिवार की अकेली कमाने वाली थीं कंचन

, कंचन बाई के पति शिवलाल लकवाग्रस्त हैं और परिवार की एकमात्र कमाने वाली वही थीं। वह अपने पति के इलाज, एक बेटे और दो बेटियों की परवरिश और पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।

गांव में शोक, प्रशासन से मदद की मांग

इस घटना के बाद पूरे गांव में शोक का माहौल है। ग्रामीणों ने प्रशासन से आंगनवाड़ी परिसर में मौजूद मधुमक्खियों के छत्ते को तुरंत हटाने और कंचन बाई के परिवार को आर्थिक सहायता व सरकारी मुआवजा देने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि कंचन बाई की बहादुरी ने 20 मासूम बच्चों की जिंदगी बचाई, लेकिन इसकी कीमत उन्होंने अपनी जान देकर चुकाई. कंचन बाई मेघवाल अब सिर्फ एक आंगनवाड़ी रसोइया नहीं, बल्कि साहस और बलिदान की मिसाल बन गई हैं।

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