गांव में क्या रखा है…

गांव में रखा ही क्या है
छुपा रखा है एक जमाना
लोग कहते हैं गांव में क्या रखा है
गांव में मेरे बचपन की सुनहरी यादें
गर्मी में तारों की छांव में लगी मच्छरदानी।
बिस्तर पर दादी विजना डुलाती साथ में
दादी सुनाती कहानी ।
सुनते-सुनते कहानी ना जाने
मैं कब सो जाती।
रूठने पर माँ ,दादी मुझे मनाती
अपने हाथों से निवाला खिलाती
उस वक्त को तलाशता मेरा मन
लोग कहते हैं पुराने वक्त में क्या रखा है
गांव की मिट्टी में बसा है मेरा बचपन
लोग कहते हैं गांव में क्या रखा है
घर से राह में झांकते झरोखे ,
कहीं नीम की ठंडी हवा के थे झोंके
चौपाल में होते थे दादा,ताऊ,चाचा
घर के मुखिया और काका।
कुओं से वहता ,वरहो में पानी
पेड़ों पर आम से भरी होती डाली,
खेतों की छटा होती थी निराली
पगडंडियों पर घुमती थी घसीयारी
पुराने बक्सों को तलाशती मेरी
आँखे, उन पुराने बक्सों में बन्द है एक
जमाना।
लोग कहते हैं गांव में क्या रखा है

सुरभि डागर, प्रसिद्ध साहित्यकार, बिजनौर

6 thoughts on “गांव में क्या रखा है…

  1. बहुत सुंदर। गांव में वो है,जो शहरों में लोग पैसा देकर खरीदते हैं,जो फिर भी सिर्फ मन समझाने के लिए होता है। शुद्ध खाद्य,शुद्ध आबोहवा,शुद्ध रिश्ते और उनकी समझ, शुद्ध मन और चिंतन,शुद्ध प्यार और स्नेह। बहुत सुंदर रचना। बहुत बधाई और शुभकामनाएं 🙏🌺💐

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