gulmohar

धुंध में धुन

नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”

Read More

गांव में क्या रखा है…

लोग कहते हैं, “गांव में क्या रखा है?”
पर मेरे लिए गांव सिर्फ एक जगह नहीं, मेरे बचपन की थाती है।

वहीं दादी की कहानियां थीं, मां के हाथों से खाया निवाला था, नीम की ठंडी छांव, खेतों की हरियाली और चौपाल की गर्मजोशी थी। कुएं का पानी, पगडंडियों की धूल और पुराने बक्सों में बंद वो मासूम दिन – सब वहीं छूट गए हैं।
गांव की मिट्टी में सिर्फ धूल नहीं, मेरी जड़ें हैं।
जो कहते हैं “गांव में कुछ नहीं रखा,”
शायद उन्होंने कभी गांव को जिया ही नहीं।

Read More

बूंदों के नूपुर

अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।

Read More